मारपीट, दहेज के आरोपों और अपने पहरावों को लेकर सुर्खियों में छाई ‘राधे मां’ के लिए विवादों में रहना कोई नई बात नहीं है। तीन साल पहले महामंडलेश्वर की पदवी को लेकर सुर्खियों में रही राधे मां का नाम इससे पहले भी कई बार विवादों में आ चुका है।
महामंडलेश्वर की पदवी पर विवादों के बाद अंत में अखाड़ा परिषद ने धार्मिक स्थिति और पृष्ठभूमि में एक लंबी जांच के बाद वापस ले लिया गया।
राधे मां अपने सत्संग के दौरान खुद को देवी दुर्गा की एक अवतार के तौर पर चित्रित करने के लिए वैसा ही वेश बनाती थी। इस पर विरोध के स्वर तेज होने लगे। 2003-04 में फगवाड़ा में एक हिंदू संगठन ने देवी दुर्गा की अवतार के रूप में राधे मां के चित्रण पर आपत्ति जताई और आंदोलन छेड़ा तो राधे मां को पर माफी मांगनी पड़ी थी।
महामंडलेश्वर की पदवी को लेकर भी रहीं थी सुर्खियों में
दो अगस्त, 2012 को जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर अवधशानंद गिरी जी ने गुरु पूर्णिमा पर अनुष्ठानों के बीच राधे मां को महामंडलेश्वर की पदवी दी। इस अलंकरण समारोह को गुप्त रखा गया था और अखाड़े के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, महामंडलेश्वर पदवी मिलने के अगले ही दिन राधे मां मुंबई चली गई थीं। इसके बाद उन्हें पदवी दिए जाने पर कई सवाल उठे।
जांच के लिए राधे मां के आध्यात्मिक गुरु स्वामी पंचनद के नेतृत्व में एक 11 सदस्यीय जांच समिति बनी। समिति ने राधे मां के जीवन से जुड़े विभिन्न स्थानों पर जाकर जांच की। इसके बाद उन्हें महामंडलेश्वर की पदवी से निलंबित कर दिया गया था। द्वारिकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने राधे मां को नासिक कुंभ मेले में औपचारिक ‘शाही स्नान’ में हिस्सा लेने से रोका।
23 साल की उम्र में सुखविंदर बन गई थीं ‘राधे मां’
राधे मां उर्फ गुड़िया उर्फ सुखविंदर कौर का जन्म 1964 में गांव दोरांगला (गुरदासपुर) में हुआ था। जब सुखविंदर कौर 17 साल की थी तो उनका विवाह करम सिंह हलवाई के बेटे मोहन सिंह के साथ हो गया। मोहन सिंह ने कुछ समय मिठाई की दुकान की और फिर दोहा कतर चला गया। पति का विदेश जाना सुखविंदर कौर के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ था।
इस दौरान उसने कपड़े भी सिले और जल्द ही अध्यात्म की दिशा में मुड़ गई। 23 साल की उम्र में सुखविंदर मुकेरियां में डेरा परमहंस बाग के महंत रामाधीन दास की शिष्या बन गई। महंत ने उसे आध्यात्मिक दीक्षा दी और ‘राधे मां’ के रूप में नया नाम दिया। इसके बाद वह सत्संग करने लगी और खानपुर में मां भगवती मंदिर राधे मां का आध्यात्मिक केंद्र बन गया। लोग कहते हैं कि इस तरह के सत्संग के दौरान वह अपने भक्तों को वरदान देती थी जिससे उनके संकट दूर रहते थे।
भक्त राधे मां को मुंबई ले गया
ऐसा ही एक आशीर्वाद राधे मां ने मुंबई के एक भक्त को दिया और उसका कोई गंभीर मसला हल हो गया। वही भक्त राधे मां को मुंबई ले गया। इसके बाद वह नियमित रूप से मुकेरियां आती रहीं।
बाद में वह मुंबई में अपनी आध्यात्मिक बैठकों में व्यस्त हो गई और पति और दो बेटों के साथ मुंबई में ही रहना शुरू कर दिया। तब से राधे मां का मुकेरियां आना कम हो गया। अंतिम बार वह पिछले साल राम नवमी पर मुकेरियां आई थीं।
आध्यात्मिकता पर पारिवारिक रंग
मुकेरियां के पास राष्ट्रीय राजमार्ग पर खानपुर में राधे मां का आध्यात्मिक निवास मां भगवती मंदिर है। मंदिर में उनकी बहन अपने परिवार के साथ रहती हैं और मंदिर की देखरेख करती हैं। भक्तों के बीच सुखविंदर कौर के पति को पिता का दर्जा मिला हुआ है और उन्हें ‘डैडी जी’ कहा जाता है। राधे की बहन को भक्त ‘रज्जी मासी’ और उनके पति को ‘मासड़ जी’ कह कर संबोधित करते हैं।