पश्चिम बंगाल में भाजपा की बंपर जीत से पंजाब का सियासी पारा बढ़ गया है। सूबे में 2027 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा अब रणनीति को और धार देगी। गुणा गणित के साथ हर सीट पर अलग रणनीति तैयार की जाएगी। क्योंकि मतदाताओं का मिजाज अलग है।
बंगाल में भाजपा की बंपर जीत से पंजाब का सियासी पारा बढ़ गया है। इन नतीजों से पंजाब के भाजपाई खासे उत्साहित हैं, क्योंकि फरवरी 2027 में यहां भी विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। लिहाजा नेताओं में जोश है और उन्होंने बंगाल के बाद अब पंजाब की बारी का नारा भी बुलंद कर दिया है।
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एक ओर जहां इस उत्साह को बनाए रखना पड़ेगा वहीं दूसरी ओर भाजपा ने अब अपनी रणनीति को और धार देने की तैयारी कर ली है। अभी तक यह भी तय माना जा रहा है कि भाजपा इस बार भी अकेले ही चुनावी समर में उतरेगी क्योंकि पार्टी नेता यह महसूस कर रहे हैं कि जब वे पंजाब के मतदाताओं के बीच अकेले अपने मुद्दे लेकर जाते हैं तो उनका वोट प्रतिशत बढ़ता है।
इसी गुणा गणित के साथ भाजपा ने हर सीट पर अलग रणनीति बनाने का काम शुरू कर रखा है क्योंकि भाजपा जानती है कि यहां मालवा, माझा, दोआबा और पुआध इलाके में मतदाताओं का मिजाज भी अलग है और सियासत भी।
बंगाल की तरह पंजाब भी बाॅर्डर स्टेट है, फर्क सिर्फ इतना है कि में घुसपैठ का मुद्दा हावी था और पंजाब में सीमा पार से नशे व हथियारों की तस्करी व गैंगस्टरवाद का मुद्दा गरमाया हुआ है। इन्हीं प्रमुख मुद्दों पर पूरी तरह सियासत होगी। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी मोगा रैली में पंजाबियों से यह वादा कर चुके हैं कि पंजाब में भाजपा आती है तो दो साल के भीतर प्रदेश नशा मुक्त होगा।
गांवों और पंथक पकड़ वाले नेताओं पर नजर
पंजाब फतेह करने के लिए भाजपा अपनी कमजोर कड़ियों को मजबूत करने की रणनीति बना रही है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि शहरों में भाजपा मजबूत हो रही है मगर ग्रामीण इलाकों में पैठ बढ़ानी है। दूसरा, पंथक पॉलिटिक्स में भी भाजपा को थोड़ी बढ़त चाहिए। इसलिए भाजपा सूबे में दूसरे दलों के ऐसे नेताओं को पार्टी में शामिल करवा रही है जिनकी ग्रामीण मतदाताओं और पंथक मुद्दों पर अच्छी पकड़ है।
जातीय समीकरणों पर बढ़ेगा फोकस
भाजपा अब पंजाब के जातीय समीकरणों पर अपना फोकस बढ़ाएगी। भाजपा को इस बात का अहसास है कि इन समीकरणों को साधे बिना पंजाब जीतना मुश्किल है। इसकी तैयारी शुरू कर दी गई है। पंजाब के करीब 12 प्रतिशत सैनी समाज और इनके प्रभाव वाली लगभग 16 सीटों पर हरियाणा के सीएम नायब सिंह सैनी ने पहले ही मोर्चा संभाल रखा है।
विकास के मामले में बात भले ही हरियाणा मॉडल की होगी मगर मुद्दे पंजाब के ही उछाले जाएंगे। इसी तरह अन्य ओबीसी जातियों समेत एससी, जट सिख व सिखों को साधने के लिए विभिन्न मुद्दों के साथ अलग रणनीति बनेगी।
बढ़े वोट प्रतिशत से पार्टी उत्साहित
साल 1980 में भाजपा ने पहली बार अकेले चुनाव लड़ा और 6.48 प्रतिशत वोट हासिल कर एक सीट जीती थी। साल 1992 आते-आते वोट प्रतिशत 16.5 हो गया और उस वक्त भाजपा ने विधानसभा की 6 सीटें जीतीं।
साल 1997 से लेकर 2017 तक भाजपा क्षेत्रीय पार्टी शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन में रही। इस दौरान वोट प्रतिशत 8.3 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया। पांच चुनावों में तीन बार गठबंधन सरकार भी बनी। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने शिअद से नाता तोड़ दिया।
इस चुनाव में दो सीटें जीतीं और वोट प्रतिशत 6.6 रहा मगर साल 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने भले ही पंजाब में कोई सीट नहीं जीती मगर वोट प्रतिशत 18.6 प्रतिशत तक पहुंच गया। शाह ने भी मोगा में यह दावा किया था जिस सूबे में वोट प्रतिशत 19 प्रतिशत के पास पहुंच जाता है वहां भाजपा सरकार बना लेती है।