विधानसभा में विधेयक पारित करने के बाद हालात ऐसे भी दिखाई दिए कि कैप्टन ने केंद्र को खुली चुनौती दी कि केंद्र चाहे तो उनकी सरकार गिरा दे। इसी मजबूत कदमों ने कैप्टन को पंजाब में किसानों, मजदूरों के साथ-साथ उन सभी लोगों की नजर में हीरो बना दिया है, जो किसान आंदोलन को सही मानते हुए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं। इसके साथ ही निकाय चुनाव में मिली जीत का एक असर यह भी दिखाई दिया कि केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा किसान आंदोलन को लेकर गंभीर चिंतन में जुट गई है।
भाजपा को पंजाब में अपने खराब प्रदर्शन से अब यह लगने लगा है कि आगामी लोकसभा चुनाव में उत्तर भारत के किसानों की नाराजगी उसे जोरदार झटका दे सकती है। हालांकि भाजपा शासित राज्यों में किसानों का आंदोलन कमजोर रहा लेकिन केंद्रीय भंडार में सबसे ज्यादा अनाज का योगदान देने वाले पंजाब के किसान सड़कों पर उतर आए हैं।
कैप्टन का ही प्रभाव था कि किसानों ने अपने आंदोलन को शांतिपूर्ण बनाए रखा। 26 जनवरी को लाल किला हिंसा के समय भी कैप्टन सबसे पहले ऐसे नेता रहे, जिन्होंने हिंसा की निंदा करते हुए यहां तक कहा कि पाकिस्तान ऐसी ही हिंसा चाहता था।
सिद्धू का कद बढ़ाने की कवायद फिर ठंडे बस्ते में
निकाय चुनाव में कैप्टन के नेतृत्व में कांग्रेस की जोरदार जीत ने उस कवायद को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया है, जिसके तहत नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस में कैप्टन के बराबर कोई ओहदा देने की कोशिशें तेज हुई थीं। पार्टी के प्रदेश मामलों के प्रभारी हरीश रावत तो सिद्धू को सोनिया गांधी से मिलाने के बाद पंजाब लौटकर कैप्टन से भी मिले और उन्हें सिद्धू को लेकर सोनिया गांधी का संदेश सुनाया।
माना जा रहा था कि हरीश रावत सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष या उप मुख्यमंत्री का पद दिलाना चाह रहे थे, जबकि कैप्टन सिद्धू को फिर से कैबिनेट में लेने के ही पक्ष में रहे। आलाकमान के जरिये कैप्टन पर बनाए जा रहे दबाव को निकाय चुनाव में पार्टी की जीत ने लगभग बेअसर कर दिया है, क्योंकि आलाकमान के सामने कैप्टन का कद इतना बढ़ा है कि वे अपनी बात मनवा सकते हैं।