फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पंजाब चुनावः जीती तो भाजपा, हारा तो शिअद

Thu, 17 Apr 2014 03:34 PM IST
अनिल भारद्वाज/अमर उजाला, अमृतसर
विज्ञापन
विज्ञापन
पंजाब की दो हाई प्रोफाइल सीट अमृतसर और गुरदासपुर पर भाजपा से ज्यादा शिरोमणि अकाली दल की साख दांव पर है। बेशक दोनों ही लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा के दिग्गज चुनाव मैदान में हैं लेकिन उनकी टक्कर शिअद के धुर विरोधियों से होने की वजह से अकालियों के लिए ये सीटें जीतना बहुत जरूरी हो गया हैं।
विज्ञापन


इन हालात में यह कहना गलत नहीं होगा कि इन सीटों पर शिअद के कंधों पर सवार होकर भाजपा चुनावी समर में कांग्रेसियों से दो-दो हाथ कर रही है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली के अमृतसर और पूर्व केंद्रीय मंत्री व सिने स्टार विनोद खन्ना के गुरदासपुर से भाजपा प्रत्याशी होने की वजह से यह दोनों ही सीटें, ‘हॉट सीट’ की श्रेणी में शामिल हो गई हैं।

इससे भी बढ़कर कांग्रेस ने अमृतसर से पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और गुरदासपुर से पीपीसीसी के मौजूदा अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा को पार्टी प्रत्याशी बनाकर, इन दोनों लोकसभा क्षेत्रों को हाई प्रोफाइल बना दिया है।
विज्ञापन

कैप्टन-बाजवा को हराना बादलों के लिए नाक का सवाल

कैप्टन और बाजवा के बजाय कोई दूसरा कांग्रेस की तरफ से इन सीटों पर प्रत्याशी होता, तो शायद शिअद यहां इतनी तवज्जो न देता। लेकिन अब दल की नाक का सवाल पैदा हो गया है। एक तरह से अमृतसर में लड़ाई जेटली और कैप्टन के बीच न होकर, मजीठिया बनाम अमरिंदर बन चुकी है।

दूसरे अर्थों में कहे तो तो मुकाबला बादल-मजीठिया बनाम कैप्टन अमरिंदर है। इसी प्रकार गुरदासपुर में सीधी लड़ाई तो बाजवा और खन्ना के बीच है, लेकिन इसे बादल बनाम बाजवा कहना ज्यादा सही प्रतीत होता है। आज पंजाब में बादल-मजीठिया परिवार को जिन कांग्रेसी नेताओं से कड़ी चुनौती है, उनमें कैप्टन और बाजवा के नाम सबसे ऊपर हैं।

लोकसभा चुनाव में कैप्टन तथा बाजवा की हार बादल-मजीठिया के भविष्य की डगर को और समतल करेगी, जबकि इन दोनों कांग्रेसी दिग्गजों की जीत शिअद के सियासी भविष्य पर प्रश्न चिह्न लगा देगी।

एनडीए की सरकार बनी तो जेटली का मंत्री बनना तय

अमृतसर सीट से चुनाव लड़ रहे अरुण जेटली भाजपा के चंद नीति निर्धारक नेताओं में से एक हैं। ऐसे में जेटली की जीत या हार से उनके सियासी भविष्य पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला, क्योंकि वह पहले से ही राज्यसभा सदस्य हैं और यदि केंद्र में एनडीए सरकार बनती है, तो उनका प्रभावशाली मंत्री बनना तय है।

उधर, शिअद के लिए जेटली की जीत का महत्व बहुत ज्यादा है। उनकी जीत से एनडीए में शिअद का प्रभाव काफी बढ़ जाएगा कि इसने पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर जैसे दिग्गज को हराने में जेटली के लिए दिन-रात एक किया। इसी प्रकार यदि गुरदासपुर में प्रताप सिंह बाजवा के मुकाबले भाजपा के विनोद खन्ना को जितवाने में शिअद नेता कामयाब हो जाते हैं, तो उनके पास यह प्रचारित करने का मौका होगा कि जब पीपीसीसी अध्यक्ष को ही हरा दिया, तो बाकी क्या बचा।

इसके उलट कैप्टन अमरिंदर और प्रताप सिंह बाजवा के जीतने की स्थिति में शिअद के पास जवाब देने को शब्द नहीं होंगे। इसलिए शिअद दिग्गजों प्रकाश सिंह बादल, सुखबीर सिंह बादल और बिक्रम सिंह मजीठिया का पूरा जोर इसी बात पर लग गया है कि किसी भी तरह से अमृतसर-गुरदासपुर सीटें निकाल ली जाएं। इस प्रकार इन दोनों सीटों पर शिअद के कंधों पर सवार भाजपा नेता, अपने गठबंधन सहयोगियों की तुलना में ज्यादा आराम में हैं।

2009 के बजाय 2012 में सुधरा गठबंधन का प्रदर्शन

अमृतसर तथा गुरदासपुर लोकसभा क्षेत्रों के अधीन आती विधानसभा सीटों पर अकाली-भाजपा गठबंधन का प्रदर्शन 2009 के लोकसभा चुनाव की तुलना में 2012 के विधानसभा चुनाव में सुधरा। अमृतसर सीट पर लोकसभा चुनाव में अकाली-भाजपा गठबंधन को पांच विधानसभा क्षेत्रों में लीड मिली थी। यहां से भाजपा के नवजोत सिंह सिद्धू 6858 मतों के अंतर से जीते थे।

उन्हें लोकसभा क्षेत्र के अधीन आती अजनाला, राजा सांसी, मजीठा, अमृतसर साउथ और अटारी सीटों से लीड मिली थी। अमृतसर नॉर्थ, वेस्ट, सेंट्रल व ईस्ट सीटों पर कांग्रेस की लीड थी। इसके बाद 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में गठबंधन ने छह विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की। इनमें अजनाला, अमृतसर ईस्ट, नॉर्थ व साउथ, मजीठा और अटारी शामिल हैं।

अमृतसर सेंट्रल व वेस्ट तथा राजसांसी कांग्रेस की झोली में गईं। वहीं, गुरदासपुर लोकसभा सीट पर 2012 में कांग्रेस के प्रताप सिंह बाजवा ने भाजपा के विनोद खन्ना को 8342 मतों के अंतर से हराया था। बाजवा को छह विधानसभा क्षेत्रों सुजानपुर, भोआ, पठानकोट, दीनानगर, कादियां और बटाला में लीड मिली थी। गुरदासपुर, फतेहगढ़ चूड़ियां और डेरा बाबा नानक में खन्ना आगे रहे।

फिर 2012 के विधानसभा चुनाव में भी इस सीट पर कांग्रेस को अकाली-भाजपा गठबंधन से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में जीत हासिल हुई, लेकिन सीटों का आंकड़ा कुछ बदला। लोकसभा के 6-3 के बजाय आंकड़ा 5-4 हो गया। कांग्रेस को पांच सीटों दीनानगर, कादियां, बटाला, फतेहगढ़ चूड़ियां और डेरा बाबा नानक में जीत मिली, जबकि चार सीटें सुजानपुर, भोआ, पठानकोट व गुरदासपुर गठबंधन की झोली में गईं।

इसके अलावा इस चुनाव में अकाली-भाजपा गठबंधन के मत प्रतिशत में भी सुधार हुआ। अब देखना है कि गठबंधन इन दोनों लोकसभा सीटों पर अपने प्रदर्शन के सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ा पाता है या फिर नतीजा कुछ और ही रहता है।
विज्ञापन

आयोग की सूची में भी गुरदासपुर-अमृतसर अव्वल

पंजाब के लोकसभा क्षेत्रों की जो लिस्टिंग भारतीय चुनाव आयोग की ओर से की गई है, उनमें यह दोनों सीटें पहले दो नंबरों पर हैं। गुरदासपुर संसदीय सीट का नंबर-1 और अमृतसर का नंबर-2 है। अब दिग्गजों की लड़ाई ने इन्हें असल में पहले नंबरों की सीट बना दिया है।

1977 से 2009 के लोकसभा चुनाव का लेखा-जोखा
लोकसभा क्षेत्र-----भाजपा-----कांग्रेस-----अन्य
गुरदासपुर-----------3----------6--------1
अमृतसर------------3----------5--------2
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें