बच्चों की मां द्वारा उनके दादा दादी के पास रहने को अवैध कस्टडी बताते हुए दाखिल की गई याचिका को पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि दादा-दादी के पास रहने से बच्चे में सामाजिक सामंजस्य पैदा होता है। यदि मां को बच्चों की कस्टडी चाहिए तो उसे निचली कोर्ट में याचिका दाखिल करने की छूट है।
कुरुक्षेत्र की एक महिला, जो अब ऑस्ट्रेलियाई नागरिक है, ने आरोप लगाया गया था कि ससुराल वालों ने उसके बेटे को जबरन अपने पास रखे हुए है। महिला ने कोर्ट को बताया कि उसकी शादी दिसंबर 2009 में पंचकूला में हुई थी ओर वे विदेश में रहते थे। इसी बीच पति बच्चे को लेकर घर आ गया।
बच्चा विदेश में रहने के कारण भारत मे रहने योग्य नहीं, क्योंकि उसका सामाजिक स्तर विदेश का है। महिला ने यह भी शिकायत की कि पति उसे दहेज के लिए भी तंग करता है। पति ने खुद का बचाव किया और आरोप लगाया कि उसकी पत्नी के विवाहेतर संबंध थे। कोर्ट ने महिला की याचिका खारिज करते हुए कहा कि दादा- दादी के पास बच्चों को सही माहौल मिलता है।
महिला वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बच्चे से संपर्क कर सकती है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे की कस्टडी पर अपना दावा तय करने के लिए पत्नी अंबाला में स्थानीय अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है। हाईकोर्ट का यह आदेश इस लिहाज से भी अहम है कि हाईकोर्ट ने दादा दादी की देखरेख में बच्चों की परवरिश को अवैध हिरासत मानने से फिलहाल अंतरिम तौर पर इंकार किया है।