हरियाणा एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के विरोध में धरने पर बैठे वकीलों द्वारा याचिकाकर्ताओं को कोर्ट में जाने से रोकने पर हाईकोर्ट ने कड़ा रवैया अपनाते हुए इसे असंवैधानिक और गैर कानूनी करार दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि इंसाफ के लिए किसी को कोर्ट में जाने से रोकना उसका हक छीनना है और ऐसा होने पर हाईकोर्ट मूक दर्शक नहीं रहेगा। लिहाजा हाईकोर्ट ने प्रशासक के सलाहकार सहित गृह सचिव और डीजीपी को बुधवार सुबह दस बजे पेश होकर इस मसले के निपटारे के लिए हाईकोर्ट की मदद करने के आदेश दिए हैं।
वकीलों की हड़ताल को लेकर हाईकोर्ट द्वारा लिए गए संज्ञान मामले में गठित चीफ जस्टिस कृष्ण मुरारी, जस्टिस राजीव शर्मा व जस्टिस आरके जैन की फुल बेंच ने याचिकाकर्ताओं की शिकायतों को आधार बनाते हुए मंगलवार को सुनवाई आरंभ की। फुल बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को कोर्ट में प्रवेश से रोकना न केवल असंवैधानिक है बल्कि गैर कानूनी भी है। शिकायतों में बताया गया है कि गेट नंबर-1 को छोड़कर बाकी सब गेट बंद कर दिए जाते हैं और गेट नंबर एक पर एक हेल्प डेस्क बनाया गया कि जो बेहद जरूरी केस होने की स्थिति में याचिकाकर्ताओं को अंदर जाने की अनुमति देता है।
उनके अतिरिक्त किसी और को अंदर नहीं जाने दिया जाता, जो सीधे तौर पर न्याय प्रक्रिया में दखल है। हाईकोर्ट ने इस सब पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि हाईकोर्ट चंडीगढ़ में है और यहां कानून व्यवस्था बनाए रखना चंडीगढ़ प्रशासन की जिम्मेदारी है। ऐसे में हाईकोर्ट ने अब चंडीगढ़ प्रशासक के सलाहकार, गृह सचिव और डीजीपी सहित एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया, असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया को भी बुधवार सुबह हाईकोर्ट में पेश हाने के आदेश दिए हैं। बुधवार को तय किया जाएगा कि ऐसा क्या प्र्रबंध हो कि याचिकाकर्ताओं को कोर्ट में आने में परेशानी न हो।
अदालत में जाने से रोकना बार एसोसिएशन को पड़ा भारी
हरियाणा एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (हैट) के विरोध में याचिकाकर्ताओं को अदालत में न जाने देना पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट बार एसोसिएशन को भारी पड़ गया। मामला एक महिला की कस्टडी से जुड़ा हुआ है। महिला की कस्टडी लेने के लिए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में फरियाद लगाई थी और उसके पिता से उसे मुक्त कराने की अपील की थी।
मामले की सुनवाई के लिए याचिकाकर्ता, महिला और महिला के पिता हाईकोर्ट पहुंचे थे। वकीलों ने याचिकाकर्ता और महिला को तो कोर्ट में जाने दिया, लेकिन महिला के पिता को कोर्ट में नहीं जाने दिया। उधर, अदालत ने इस मामले में सख्ती बरतते हुए बार एसोसिएशन के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि बार एसोसिएशन महिला के पिता को 50 हजार रुपये बतौर मुआवजा देगा।
जब कोर्ट को इस बारे में बताया गया तो हाईकोर्ट ने इस पर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि वकालत का लाइसेंस मुवक्किल के हक की लड़ाई लड़ने के लिए और समाज को बेहतर बनाने के लिए दिया जाता है। वकील को कानून की बेहद अच्छी जानकारी होती है और उससे उम्मीद की जाती है कि वह समाज को बेहतर बनाने के लिए कार्य करे।
इस प्रकार नागरिकों को न्याय मिलने की राह में रोड़ा डालना किसी भी तरीके से सही करार नहीं दिया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि न्याय का अधिकार हर नागरिक का सांविधानिक अधिकार है और इस अधिकार को छिनते हुए हाईकोर्ट नहीं देख सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि महिला के पिता की गैर मौजूदगी के कारण इस केस में फैसला नहीं सुनाया जा सकता, इसलिए अगली सुनवाई पर इस पर निर्णय लिया जाएगा। इस दौरान महिला ने कहा कि वह अपने पिता के साथ नहीं रहना चाहती है, इसलिए उसे नारी निकेतन भेज दिया जाए, जिसे हाईकोर्ट ने मंजूर करते हुए उसे नारी निकेतन भेज दिया।