पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने भिवानी के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज के फैसले पर सवाल उठाया है और जवाब तलब भी कर लिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी के दो मुख्य आरोपियों को जमानत दे दी गई, लेकिन जिसका नाम एफआईआर में नहीं है, उसकी अग्रिम जमानत याचिका कैसे खारिज कर दी गई। जस्टिस अरविंद सिंह सांगवान ने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को आदेश दिया कि वह एडीजे से जवाब तलब करें कि मुख्य आरोपियों को जमानत देने का आधार क्या है?
हाईकोर्ट ने यह आदेश भिवानी निवासी मोहन शर्मा की अग्रिम जमानत की मांग पर सुनवाई करते हुए दिया। याची मोहन शर्मा ने हाईकोर्ट को बताया कि साहिल कोकचा व लक्ष्मी कोकचा ने भिवानी की श्री राम फाइनेंस से दस लाख रुपये कर्ज लिया था। इसके बदले उन्होंने अपना घर श्री राम फाइनेंस के पास गिरवी रखा था। सात महीने तक तो उन्होंने लोन की किश्त अदा की लेकिन उसके बाद किश्त देनी बंद कर दी। कुछ दिन बाद पता चला कि साहिल कोकचा और लक्ष्मी कोकचा ने फर्जी एनओसी के सहारे मकान कीर्ति नामक महिला को बेच दिया व एमसी रिकार्ड में बदलाव कर लिया।
जबकि मकान की ओरिजिनल सेल डीड कंपनी के पास थी। कंपनी ने दोनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी। याचिकाकर्ता ने बताया कि दोनों मुख्य आरोपियों सहित उसकी याचिका पर एक ही एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज ने सुनवाई की। लेकिन जिनका नाम एफआईआर में दर्ज था उन्हें जमानत दे दी, जबकि याची जो बैंक कर्मचारी है और जिसका नाम एफआईआर में भी नहीं है, उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी। याची पर आरोप है कि एनओसी उसके द्वारा जारी की गई, जबकि उसने किसी भी एनओसी पर कोई हस्ताक्षर नहीं किए।
पुलिस इस मामले की सही जांच नहीं कर रही। हाईकोर्ट ने इस मामले में मुख्य आरोपियों को दी गई जमानत पर सवाल उठाते हुए तल्ख टिप्पणी की तथा याचिकाकर्ता को सशर्त जमानत का लाभ दे दिया।