दो-दो दशकों से राज्य की सेवा में लगे कच्चे कर्मचारियों को पक्का करने के लिए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार को नीति बनाने का आखिरी मौका दिया है। इससे पहले सरकार ने एक माह में नीति बनाने की हाईकोर्ट में अंडरटेकिंग दी थी। कच्चे कर्मचारियों ने हाईकोर्ट की सिंगल बेंच में याचिका दाखिल करते हुए कहा था कि वे करीब दो दशक से हरियाणा के विभिन्न विभागों में कार्यरत हैं। उनके साथ के कर्मियों को पक्का कर दिया गया लेकिन याचिकाकर्ताओं को पक्का नहीं किया गया।
हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने आदेश जारी करते हुए याचिकाकर्ताओं को जिस समय उनकी दस साल की सेवा पूरी हो तभी से रेगुलर करने के आदेश दिए थे। इसके खिलाफ हरियाणा सरकार ने खंडपीठ में अपील की थी। हरियाणा सरकार ने कहा था कि याकिचाकर्ताओं को राहत देने का फैसला गलत है। हाईकोर्ट ने याचिका पर सिंगल बेंच के सामने याची रहे और खंडपीठ के समक्ष प्रतिवादी तीन कर्मियों को नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल करने के आदेश दिए थे। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने नोटिस जारी कर पूछा था कि क्यों न इस आदेश पर रोक लगा दी जाए।
नोटिस के जवाब में प्रतिवादी पक्ष हाईकोर्ट में पेश हुआ और अपना पक्ष रखा। इस दौरान हाईकोर्ट को उमा देवी मामले का हवाला देते हुए कहा कि सेवाएं इतने लंबे समय तक दी गई हैं और उनके साथ के लोगों को रेगुलर कर दिया गया है जबकि उनको नहीं किया गया। यह न केवल उमा देवी मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ है बल्कि समानता के अधिकार का भी उल्लंघन है। इस मामले में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को रेगुलर करने पर सरकार को उनका पक्ष रखने के आदेश दिए थे।
आदेश के अनुरूप पिछली सुनवाई पर हरियाणा सरकार ने हाईकोर्ट से फिर से समय मांगा गया और बताया कि सरकार कच्चे कर्मियों को पक्का करने के लिए नीति बना रही है। हाईकोर्ट ने इसपर सरकार को आदेश जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर इस नीति को फाईनल कर हाईकोर्ट में सौंपने के आदेश दिए थे। अब जब मामला सुनवाई के लिए पहुंचा तो हाईकोर्ट से फिर मोहलत मांगी गई। इसपर हाईकोर्ट ने सरकार को जमकर फटकार लगाई और नीति बनाकर अगली सुनवाई पर हर हाल में नीति बना इसे सौंपने का आखिरी अवसर दिया है।