पंजाब में 10 साल बाद कांग्रेस लौट तो आई, लेकिन राह आसान नहीं होगी। उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी, एक ऐसा मुद्दा जिसके लिए दो राज्यों की साख दांव पर लगी है। पंजाब और हरियाणा के बीच पांच दशकों से विवाद का कारण बनी रही सतलुज-यमुना लिंक नहर के मामले में हरियाणा सरकार ने अपने वार्षिक बजट में 100 करोड़ रुपये का प्रावधान कर एक तीर दो निशाने साधने की कोशिश की है।
हरियाणा सरकार ने यह पैसा नहर के निर्माण के लिए रखा है, लेकिन इसके सहारे प्रदेश सरकार ने पंजाब में बनने जा रही नई सरकार को चुनौती दी है। पंजाब की मौजूदा शिअद-भाजपा गठबंधन सरकार जोकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को भी दरकिनार करते हुए नहर के लिए अधिग्रहीत की गई जमीन उनके मालिकों को लौटा चुकी है, की ओर से एसवाईएल पर लिए गए फैसले नई सरकार के लिए नया इम्तिहान खड़ा करने जा रहे हैं।
हरियाणा विधानसभा में बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु ने कहा कि एसवाईएल नहर के निर्माण के लिए लगभग 1000 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी और सरकार यह राशि उपलब्ध कराएगी, लेकिन वास्तविकता यह है कि एसवाईएल नहर का जितना निर्माण बाकी है, वह पंजाब के क्षेत्र में पड़ता है। इसके लिए हरियाणा की ओर से तय किया गया पैसा नहीं लग सकता।
नई सरकार पर दबाव बनाने के लिए उठाया गया कदम
कैप्टन अमरिंदर सिंह
माना जा रहा है कि हरियाणा सरकार ने यह कदम पंजाब की नई सरकार पर दबाव बनाने के लिए ही उठाया है। केंद्र और पंजाब में भाजपा सत्ता में होने के कारण हरियाणा सरकार इस मुद्दे को खुलकर नहीं उठा रही थी और बीते सवा दो साल के दौरान हरियाणा सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देकर हरियाणा, केंद्र और पंजाब में भाजपा का बचाव करती रही।
वहीं, हरियाणा में विपक्षी दल इस मामले में केंद्र की भाजपा सरकार से हस्तक्षेप की मांग उठाकर प्रदेश सरकार को भी घेरते रहे हैं। दूसरी ओर, पंजाब में अब तक विपक्ष में बैठी कांग्रेस भी शिअद-भाजपा गठबंधन पर नहर निर्माण के लिए जिम्मेदार ठहराती रही है, लेकिन अब पंजाब में कांग्रेस या आम आदमी पार्टी की सरकार बनने की संभावना को देखते हुए हरियाणा सरकार एसवाईएल निर्माण की गेंद कांग्रेस या आप के पाले में डालने की कोशिश कर रही है, जिससे नहर न बनने के लिए पंजाब में इन्हीं पार्टियों को दोषी ठहराया जा सके। इसके साथ ही, एसवाईएल के लिए अपने बजट में प्रावधान कर हरियाणा की भाजपा सरकार केंद्र को भी इस मामले से दूर रखने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।