प्रो. संजीव ने बताया कि जैवनिम्नीकरणीय ऐसे अपशिष्ट पदार्थ हैं जो प्राकृतिक कारकों जैसे कि सूक्ष्म जीवों (जैसे बैक्टीरिया, कवक आदि) और अजैविक तत्वों जैसे कि तापमान, यूवी, ऑक्सीजन द्वारा विघटित हो सकते हैं। ऐसे अपशिष्ट पदार्थ के कुछ उदाहरण खाद्य पदार्थ, रसोई के अपशिष्ट और अन्य प्राकृतिक अपशिष्ट हैं। ये डंप कूड़े के निचले स्तर में होते हैं, जहां हवा नहीं जाती। इससे जहरीली गैस निकलती है जो पर्यावरण को प्रदूषित करती है। वहीं, कूड़े से मिट्टी में रिसकर जाने वाला पदार्थ मिट्टी को भी लगातार प्रदूषित करता है। इन दोनों स्थितियों से बचाव में नई तकनीक से काफी लाभ मिल सकता है।
प्रो. संजीव ने बताया कि मौजूदा समय में अलग-अलग उर्वरक 250 से 500 रुपये प्रति लीटर की देर से बेचे जा रहे हैं, जबकि इस तकनीक से उर्वरक तैयार कर अगर 100 रुपये प्रति लीटर भी बिक्री की गई तो साल के 330 दिनों में ही 8.5 करोड़ आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। वहीं, इसके लिए प्लॉट लगाने पर एक बार का कुल आर्थिक व्यय चार करोड़ रुपये होगा।
एक टन कूड़े से 25 लीटर उर्वरक
इस तकनीक के तहत जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट में एस्परगिलस नाइजर एस-30 और क्लेबसिएला न्यूमोनिया एपी-407 सहित सूक्ष्म जीवों के एक संघ का उपयोग किया जाता है। क्लेबसिएला न्यूमोनिया एपी-407 नाइट्रोजन निर्धारण, फास्फोरस घुलनशीलता, पोटेशियम संचलन और पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देने वाले यौगिकों को मिलाकर यह उर्वरक तैयार किया जाता है। इससे प्रतिदिन एक टन जैवनिम्नीकरणीय अपशिष्ट से 25 लीटर उर्वरक तैयार किया जा सकता है।