चंडीगढ़। हार कर भी जो हारते नहीं, अपने उत्साह को जो मारते नहीं, जीत उन्हीं की होती है एक दिन, जो मुसीबत से डरना जानते नहीं। इन चंद लाइनों से रेनू सहगल और दमन मांगट की कहानी बखूबी बयां हो रही है। जिन्होंने युवावस्था में कैंसर जैसे गंभीर रोग की चपेट में आने के बावजूद हिम्मत नहीं हारी। सकारात्मक सोच और जीत की ललक के साथ आगे बढ़ीं। कैंसर को हराया और अब लगभग दो दशक से कैंसर के मरीजों की मुश्किलों को आसान करने में जुटी हुई हैं। दोनों ही महिलाएं पीजीआई और जीएमसीएच-32 के साथ जुड़कर कैंसर के मरीजों के लिए काम कर रही हैं। इसके साथ सहायता चैरिटेबल वेलफेयर सोसाइटी के संचालन में भी अहम भूमिका निभा रही हैं। ब्लड कैंसर हुआ तो यकीन करना मुश्किल था
चंडीगढ़ की पूर्व सीनियर आर्किटेक्ट रेनू सहगल ने बताया कि साल 1996 में पता चला कि मुझे ब्लड कैंसर हो गया है। सुनकर यकीन करना मुश्किल हो रहा था। यह लग रहा था कि ये बीमारी मुझे कैसे हो सकती है लेकिन हिम्मत जुटाया और सच स्वीकार कर आगे बढ़ी। ड्यूटी से दो महीने की छुट्टी ली। पीजीआई में इलाज शुरू कराया। फिर ऑफिस ज्वॉइन कर लिया। कीमो के साथ ही घर और ऑफिस की जिम्मेदारी संभाली। खुद को खाली रखा ही नहीं, जिससे नकारात्मक ख्याल हावी नहीं हुए। अब मैं पूरी तरह ठीक हूं। मेरी बहन ने कैंसर के मरीजों के लिए सहायता चैरिटेबल वेलफेयर सोसाइटी की स्थापना की। उनके बाद से ट्रस्ट की जिम्मेदारी संभाल रही हूं।
अकेले कराया इलाज, नहीं मानी हार
दमन मांगट ने बताया कि पति मर्चेंट नेवी में थे। छह महीने तक घर आना-जाना नहीं होता था। 1994 में लक्षणों के आधार पर पीजीआई में जांच कराया तो सर्विक्स कैंसर की पुष्टि हुई। उस वक्त तो लगा जैसे जिंदगी थम गई। अब आगे क्या होगा लेकिन मां ने मेरी हिम्मत बढ़ाई। उनकी सकारात्मक बातों को बहुत प्रभाव पड़ा। पीजीआई में परामर्श लिया। डॉक्टरों की राय से मुंबई स्थित टाटा मेमोरियल में सर्जरी कराने का निर्णय लिया। बड़ी बहन के साथ मुंबई गई। सर्जरी के बाद नई शुरुआत के लिए तैयार थी। जब कभी तनाव होता बागवानी करती, पेंटिंग करती। लगातार फॉलोअप के बाद कुछ वर्षों के बाद मैं पूरी तरह ठीक हो गई। अब मैं पिछले 24 वर्षों से सहायता चैरिटेबल वेलफेयर सोसाइटी के साथ जुड़कर कैंसर के मरीजों के लिए काम कर रही हूं।