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मेडिकल कॉलेजों की फीस पर सियासत गरमाई, कल मंत्री ओपी सोनी के आवास का घेराव करेगी आप

Mon, 01 Jun 2020 09:24 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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आम आदमी पार्टी। - फोटो : फाइल फोटो
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पंजाब सरकार द्वारा सरकारी मेडिकल कालेजों की फीसों में 70 से 80 प्रतिशत वृद्धि कर अप्रत्यक्ष तौर पर आम घरों के बच्चों के डॉक्टर बनने पर ही पाबंदी लगा दी है, क्योंकि आम घरों के बच्चे इतनी मोटी फीस अदा नहीं कर सकते। आम आदमी पार्टी के यूथ विंग ने इसी मुद्दे को लेकर बुधवार (3 जून) को अमृतसर में मंत्री ओपी सोनी की कोठी का घेराव करने का फैसला लिया है। 

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सोमवार को पत्रकारों से बातचीत करते हुए बरनाला से विधायक मीत हेयर, महासचिव दिनेश चड्ढा और यूथ प्रधान मनजिन्दर सिंह सिद्धू ने कहा कि हैरानी की बात है कि बाबा फरीद मेडिकल यूनिवर्सिटी के वायस चांसलर यह बयान दे रहे हैं कि जब निजी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई के लिए माता-पिता लाखों रुपये खर्च करते हैं तो डॉक्टर बनने के लिए भी अदा कर सकते हैं।


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इसका मतलब यह है कि अब निजी स्कूलों में मोटी फीस अदा करने वालों को ही सरकार डॉक्टर बनाएगी। दूसरी तरफ, सरकारी और छोटे स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब, दलित और मध्यवर्गीय घरों के बच्चों को डॉक्टर बनने का मौका भी नहीं दे रही।

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उन्होंने कहा कि 2010 में सरकारी कालेजों की एमबीबीएस की फीस 13 हजार रुपये वार्षिक थी, जो 10 साल बाद आज 12 गुना बढ़ाकर 1 लाख 56 हजार रुपये वार्षिक कर दी है। इन वर्षों में डॉक्टरों के वेतन और स्टाईपन में मामूली विस्तार किया गया। सरकार के तर्क को खारिज करते हुए मीत हेयर ने कहा कि यदि पड़ोसी राज्य हिमाचल, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के मेडिकल कॉलेज बहुत ही कम फीस के साथ चल सकते हैं तो पंजाब क्यों नहीं। 

'फीस बढ़ोतरी बड़ा घपला'
एडवोकेट दिनेश चड्ढा ने कहा कि निजी मेडिकल कॉलेजों की फीसों में बढ़ोतरी सीधे तौर पर घपला है। चड्ढा ने कागज पेश करते खुलासा किया कि उनकी ओर से दायर की गई जनहित याचिका पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन को पंजाब के गैर सरकारी कालेजों के वित्तीय खाते जांच करने के लिए कहा था। 

यूजीसी की जांच में गैर सरकारी कॉलेजों में अनियमितताएं पाई गईं थी। पंजाब के गैर सरकारी कॉलेज ट्रस्टों के खातों से मर्सिडीज जैसी शाही गाड़ियां खरीद कर, ट्रस्टों के खातों से संपत्तियां खरीदी गई। अपने परिवारिक सदस्यों को 25-25 लाख का वेतन दिया गया और अपने मन-मर्जी के खर्चे लिखने के बावजूद भी वार्षिक 9 करोड़ रुपये तक सरप्लस थे।

इसके बाद यूजीसी ने 2014 में राज्य सरकार को कार्रवाई करने को कहा था लेकिन बार-बार पैरवी करने पर भी न तो पिछली सरकार ने और न ही कांग्रेस ने इस संबंध में कार्रवाई की। यूजीसी की हिदायत को अनदेखा करके निजी मेडिकल कॉलेजों को फीस बढ़ाने की इजाजत दे दी।
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