चंडीगढ़। रेयर डिजीज माने जाने वाले कुशिंग सिंड्रोम का इलाज पीजीआई के विशेषज्ञों ने बेहद आसान कर दिया है। पीजीआई के इंडोक्राइनोलॉजी और न्यूक्लियर मेडिसिन की दो डॉक्टरों ने मिलकर इस सिंड्रोम में होने वाले ट्यूमर की डाइग्नोसिस को सटीक बना दिया है। इन मरीजों में अब तक अनुमान के आधार पर होने वाले डाइग्नोसिस को नए मॉलीक्यूल की सहायता से टारगेटेड कर दिया है।
इंडोक्राइनोलॉजी विभाग की डॉ. रमा वालिया और न्यूक्लियर मेडिसिन की डॉ. जया शुक्ला ने मिलकर सीआरएच और एम-डेस्मो नामक ट्रेसर का आविष्कार किया है। डॉ. रमा वालिया और डॉ. जया शुक्ला के इस आविष्कार का पेटेंट हो गया है। इसके बाद देश के साथ विदेशों में भी पीजीआई की मदद से इलाज की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। कुशिंग सिंड्रोम के रोगियों में सीआरएच और एम-डेस्मो का उपयोग कर पीईटी-सीटी इमेजिंग में सटीक परिणाम प्राप्त करने में सफलता हासिल की है। यह जानकारी इंडोक्राइनोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. संजय भडाडा ने मंगलवार को आयोजित प्रेसवार्ता में दी।
डॉ. रमा वालिया ने बताया कि एमआरआई और एक नइवेसिव ट्रेस्ट किया जाता है। एमआरआई का भी एक दायरा है, जो उससे छोटे ट्यूमर को ट्रेस नहीं करता लेकिन इस नए मॉलीक्यूल के ट्रेसर की मदद से पीईटी (पेट) स्कैन में फोकस बढ़ गया है। 60 प्रतिशत मामलों में तो पुरानी तकनीक परिणाम बता देती है। वहीं, रेयर केस में इनवेसिव टेस्ट में कैथेटर की मदद से ट्यूमर का पता लगाने का प्रयास किया जाता है लेकिन वो ट्यूमर का सही स्थान नहीं बताता। सिर्फ साइड बताता है। उसके बाद अनुमान के आधार पर ट्यूमर की तलाश की जाती है। इस दौरान ब्रेन की अन्य कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने का खतरा रहता है। वहीं, यह जांच 70 से 80 हजार रुपये में होती है। इस नए ट्रेसर को रेडियोआइसोटोप रिसेप्टर से लेबल किया गया है, जो ट्यूमर पर जाकर चिपक जाता है। यह चिपकने के बाद ट्यूमर के ऊपर चमकने लगता है। यह पीईटी (पेट) इमेज पर दिखने लगता है। इस तकनीक से ढाई साल के दौरान 65 मरीजों में ट्यूमर की जांच की गई। उनमें से 64 में सटीक परिणाम मिला। उन 64 मरीजों में से 43 की सर्जरी की जा चुकी है।
ट्रेसर को इंजेक्शन के माध्यम से नस में देना पड़ता है। उसके 45 मिनट के बाद ये स्कैनिंग की जाती है। ट्रेसर को एक कोल्ड किट में रखा जाता है। निकालने के तत्काल बाद उसे नस में देना पड़ता है। फिर स्कैन कर उसके इमेज को न्यूक्लियर मेडिसिन के विशेषज्ञ देखते हैं। उनकी रिपोर्ट के आधार पर न्यूरो सर्जन नाक के जरिए निकालते हैं। 45 मरीजों से ट्यूमर निकाल दिया गया है। वे अब बिल्कुल ठीक हैं।
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स्टेरॉयड का सेवन है खतरनाक
कुशिंग सिंड्रोम में कार्टिसोल हार्मोन का स्तर बहुत ज्यादा हो जाता है। इसकी अधिकता से पेट, छाती और ब्रेन में ट्यूमर हो सकता है। प्रो. संजय भडाडा ने बताया कि पेट और छाती के ट्यूमर का इलाज तो आसानी से हो जाता है लेकिन ब्रेन के ट्यूमर को निकालना मुश्किल होता है। यह छिपा होता है। इस ट्रेसर की मदद से इलाज आसान हो गया है। इस एक मर्ज का इलाज कई विभाग मिलकर करते हैं। यह बात समझनी बहुत आवश्यक है कि इसका मुख्य कारण क्या है। कार्टिसोल हार्मोन स्टेरॉयड के कारण भी बढ़ता है इसलिए बिना डॉक्टर के सलाह के स्टेरॉयड न लें। यह ऐसा मर्ज है जो कैंसर तो नहीं है लेकिन उससे भी घातक है क्योंकि इससे शरीर का हर अंग प्रभावित होता है।
कुशिंग सिंड्रोम आप भी जान लें
ऐसी अवस्था जो अत्यधिक मात्रा में कोर्टिसल नाम का हार्मोन लंबे समय तक बनने के कारण उत्पन्न होती है। यह आमतौर पर स्टेरॉयड दवाओं के इस्तेमाल से होता है, लेकिन यह गुर्दा-शीर्ष ग्रंथियों की ओर से बहुत ज्यादा कोर्टिसोल हार्मोन बनाए जाने से भी हो सकता है।