चंडीगढ़। देशभर में आधुनिक अस्पतालों की योजना, डिजाइन और हेल्थकेयर इंजीनियरिंग के विशेषज्ञ तैयार करने के लिए पीजीआई में प्रस्तावित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थकेयर इंजीनियरिंग एंड आर्किटेक्चर का सपना दो दशक बाद भी साकार नहीं हो सका। 2006 में घोषित यह परियोजना लगातार बैठकों, समितियों और पत्राचार तक सीमित रही। आखिरकार अब इसे बंद करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
कैग की हालिया ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2006 में तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने पीजीआई के दीक्षांत समारोह में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थकेयर इंजीनियरिंग एंड आर्किटेक्चर स्थापित करने की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य अस्पतालों की योजना, डिजाइन, हेल्थकेयर इंजीनियरिंग और प्रबंधन के क्षेत्र में प्रशिक्षित विशेषज्ञ तैयार करना था।
इसके बाद 2007 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने संस्थान स्थापित करने की मंजूरी दी और करीब 7 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष के बजट का प्रस्ताव भी रखा गया। 2008 से 2019 के बीच कई उच्चस्तरीय बैठकों में संस्थान के स्वरूप, पाठ्यक्रम और संचालन पर चर्चा होती रही। एमबीए (हेल्थ फैसिलिटी प्लानिंग एंड डिजाइन) और एमबीए (हेल्थकेयर इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट) जैसे कोर्स शुरू करने की योजना भी बनी।
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बैठक दर बैठक नतीजा कुछ भी नहीं
ऑडिट रिपोर्ट बताती है कि हर बैठक के बाद नई समिति बनी, नए सुझाव आए, लेकिन जमीन पर कोई प्रगति नहीं हुई। बाद में पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर और अन्य संस्थानों के साथ साझेदारी का विकल्प भी रखा गया, लेकिन वह भी अमल में नहीं आ सका। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी ने परियोजना पर स्पष्टता की कमी और पीजीआई की भूमिका को लेकर सवाल उठाए। इसके बाद मामला लगातार टलता रहा। अंततः स्वास्थ्य मंत्रालय ने परियोजना को बंद करने की प्रक्रिया शुरू करते हुए पीजीआई से स्पष्टीकरण मांगा, जिस पर संस्थान ने अपना जवाब भेज दिया है।
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प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी हो सकती है दूर
विशेषज्ञों का मानना है कि आज देश में नए मेडिकल कॉलेज, एम्स और सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल तेजी से बन रहे हैं, लेकिन अस्पतालों की वैज्ञानिक डिजाइन, मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग और हेल्थकेयर इंजीनियरिंग के प्रशिक्षित विशेषज्ञों की भारी कमी है। यदि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थकेयर इंजीनियरिंग एंड आर्किटेक्चर समय पर स्थापित हो जाता तो देश को इसी क्षेत्र में विशेषज्ञ मानव संसाधन मिल सकता था। ऑडिट रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है जब स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत बनाने पर सरकार लगातार जोर दे रही है, लेकिन दो दशक पुरानी यह राष्ट्रीय परियोजना बिना शुरू हुए ही बंद होने की कगार पर पहुंच गई है।
पीजीआई का पक्ष
पीजीआई ने बताया कि एआईआईएमएस जोधपुर में बायो-मेडिकल इंजीनियरिंग का कोर्स शुरू होने के बाद एनआईएचईए के प्रस्ताव पर दोबारा विचार किया गया। 12 मार्च 2024 को स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी के समक्ष मामला रखा गया, लेकिन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। इसके बाद आईआईटी रुड़की, चंडीगढ़ कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर (सीसीए) और पंजाब विश्वविद्यालय के साथ मिलकर संस्थान स्थापित करने की संभावना पर चर्चा की गई।
समिति ने सुझाव दिया कि इन संस्थानों के सहयोग से संयुक्त मॉडल विकसित किया जा सकता है। पीजीआई ने ऑडिट को बताया कि पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में मामला लंबित होने के कारण अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका। संस्थान की ओर से 6 सितंबर 2025 को इस संबंध में अपना अंतिम जवाब ऑडिट को भेज दिया गया।