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PGI: ये कैसी इमरजेंसी, जहां डाक्टर गायब

Tue, 17 Jun 2014 01:43 PM IST
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
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पीजीआई के इमरजेंसी में 50 साल से अधिक समय के बाद भी कोई सुधार नहीं आया है। न तो कोई ऐसा मॉनीटर सेल बनाया गया, जिससे इमरजेंसी में आ रही लापरवाही पर निगाह रखी जा सके और न ऐसी कोई अथॉरिटी बनाई गई, जिससे मरीज अपनी बात कह सके। साल्यूशन की बात होती है, लेकिन सब कुछ कागजों तक सीमित रहता है। मरीज सिर्फ रेजिडेंट डाक्टरों की मनमानी झेलते रहते हैं।
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इमरजेंसी में दोगुने से ज्यादा मरीज
आसपास के प्रदेशों में कोई बेहतरीन हास्पिटल नहीं होने की वजह से अक्सर मरीजों को इमरजेंसी में भेज दिया जाता है। यहां पर जगह न होने के बावजूद सभी मरीजों को दाखिल कर लिया जाता है। जरूरी दवाएं देने के बाद उनकी हालत पर उन्हें छोड़ दिया जाता है। पीजीआई के डाक्टरों ने बताया कि आसपास के शहरों में बेहतरीन सुविधा न होने के कारण मरीजों को यहां का रुख करना पड़ता है।

इस बारे में पहले भी चरचा होती रही हैं, लेकिन कोई भी बात मजबूती से आगे नहीं बढ़ सकी है। रेजिडेंट डाक्टरों ने भी कई बार यह मुद्दा उठाया। पिछले साल उन्होंने धरना प्रदर्शन भी किया, लेकिन उनकी नहीं सुनीं गई। रेजिडेंट डाक्टरों का कहना है कि मरीजों की संख्या इतनी ज्यादा है कि वे हर मरीज को समय नहीं दे पाते। पहले मरीजों की संख्या पर लगाम लगानी होगी, तभी इसका कोई सुधार हो सकता है।
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केस -1
उत्तराखंड के चंपा सिंह सिर में दर्द के चलते शुक्रवार को पीजीआई के इमरजेंसी में भर्ती हुए। इमरजेंसी के डाक्टरों ने उन्हें एमआरआई, सीटी स्कैन और अन्य जांच करवाने को कहा। शनिवार को मरीज ने सभी जांच करवा लीं। रविवार शाम चार बजे सभी की रिपोर्ट भी आ गई। वे अपनी जांच रिपोर्ट दिखवाने के लिए इमरजेंसी में भटकते रहे, लेकिन कोई भी डाक्टर नहीं मिला। नर्सों से बात करते तो वे उन्हें फटकार देते।

रेजिडेंस से बात करते तो कहते कि सीनियर डाक्टर ही रिपोर्ट देखेंगे। पूरे 24 घंटे बीत गए, लेकिन किसी ने भी रिपोर्ट नहीं देखी। उधर मरीज इलाज के लिए तड़पता रहा। सोमवार शाम पांच बजे जब डाक्टरों की ड्यूटी चेंज हुई तो एक भले डाक्टर ने उन्हें वार्ड में शिफ्ट करा दिया। हो सकता है कि अब शायद उसे कोई देख ले।

केस -2
पंजाब के करम सिंह ब्रेन ट्यूमर के मरीज हैं। हालत खराब होने पर उन्हें पीजीआई के इमरजेंसी में पांच दिन पहले भरती कराया गया था। उन्हें जरूरी चीजें दवाएं और कुछ टेस्ट करवाने की बात कहकर उन्हें छोड़ दिया गया है। पांच दिन बीत गए हैं, लेकिन कोई भी उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है।

उनके साथ आए परिजन बताते हैं कि डाक्टरों से बात करने की कोशिश करते तो वे ठीक से बात नहीं करते। दर्द से उनका बुरा हाल हो रहा है, लेकिन कोई भी सुनने को तैयार नहीं है। एक तो जगह भी कम है। सभी स्ट्रेचर को एक साथ चिपका कर रख दिया गया है। इससे इंफेक्शन का भी खतरा बढ़ गया है।
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