पीजीआई के ग्रुप बी, सी और डी कैटेगरी के तहत कार्यरत कर्मचारियों को पिछले 20 साल से इंसाफ का इंतजार है। इन कर्मचारियों का नेतृत्व कर रही मेडिकल टेक्नोलाजिस्ट एसोसिएशन की 29 में से 27 मांगों को केंद्रीय न्यायिक अभिकरण (कैट) ने इसी साल दस जुलाई को स्वीकार कर लिया था। साथ ही पीजीआई प्रशासन को इन मांगों को जल्द से जल्द से लागू करने के निर्देश जारी किए थे। पूरे पांच महीने बीत गए, लेकिन अब तक एक भी मांग को पीजीआई ने लागू नहीं किया है। इस बीच सूचना है कि पीजीआई प्रशासन कैट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट जाने की तैयारी में है।
इससे एसोसिएशन में काफी निराशा है। उनका कहना है कि एक तो हम 20 साल तक अपने हक के लिए लड़ते रहे। अब जब कैट ने भी मान लिया है कि उनकी लड़ाई बिल्कुल सही है। अधिकतर मांग जायज है। इसके बावजूद उन्हें पीजीआई प्रशासन उनके हक से खिलवाड़ कर रहा है। पीजीआई के कर्मचारियों पर जरूरत से ज्यादा दबाव है। इसके बावजूद बिना प्रमोशन व अन्य कटौतियों के बावजूद पूरी ईमानदारी और मेहनत से काम कर रहे हैं।
इन प्रमुख मांगों को किया था स्वीकार
1.धर कमेटी की समयबद्ध प्रमोशन योजना को मेडिकल टेक्नोलाजिस्ट पर लागू की जाएं
2. कैडर एनोमेली कमेटी की सिफारिशों को जल्द से जल्द से लागू किया जाए।
3. मेडिकल टेक्नोलाजिस्ट की बेसिक पेय 4200 को रिवाइज करने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी जाएं।
4. 1998 से बंद पेशंट केयर अलाउंस फिर से शुरू करने की मांग स्वीकारी
5.जूनियर टेक्नीशियन की बेसिक पेय स्केल को रिवाइज करने की मांग
6.एवरेज एसीआर के आधार पर रोके गए मेडिकल टेक्नोलाजिस्ट के प्रमोशन पर तीन महीने में विचार किया जाए।
7. टेक्नीकल कर्मचारियों की नियुक्ति पर देरी न किया जाए
8. सप्ताह में 40 घंटे के काम करने की पालिसी को रिवाइज किया जाए
9. कांट्रैक्ट बेस पर पिछले 17 साल से रिसर्च कर्मचारियों को रेगुलर किया जाए
10. एक्स इंडिया लीव को बहाल किया जाए
11 मेडिकल टेक्नोलाजिस्ट की ट्रांसफर पालिसी को सही तरीके से लागू करे
12. रेजिडेंशियल क्वार्टर की मरम्मत की जाए
दस हजार कर्मचारी प्रभावित
पीजीआई के रुख से करीब दस हजार कर्मचारी प्रभावित हो रहे हैं। इनमें सात से आठ हजार कर्मचारी फिलहाल पीजीआई में काम कर रहा है जबकि बाकी रिटायर्ड हो चुके हैं। एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी अश्विनी कुमार मुंजाल कहते हैं कि दो फरवरी 1994 को पीजीआई को चार्टर आन डिमांड दिया गया था। पीजीआई ने नहीं माना तो हड़ताल कर दी गई। हड़ताल में हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया। उसके बाद पीजीआई और कर्मचारियों के बीच साल 1996 तक खेल चलता रहा। फिर पीजीआई ने 1996 में हाई पावर कमेटी बनाई। उस दौरान आधी मांगी मानी गई, जबकि आधी को दरकिनार कर दिया। उसके बाद कैट में साल 2010 में एक जनहित याचिका दायर की गई।
इस बारे में फिलहाल अभी कुछ कह पाना मुश्किल होगा और न ही इस बारे में मुझे कोई जानकारी है।
मंजू वडवालकर, प्रवक्ता पीजीआई