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#हिंदी हैं हम: चीन से एक आया वायरस, उसका नाम कोरोना... सावधानी नहीं बरती तो पड़ जाएगा रोना

Fri, 04 Sep 2020 10:59 AM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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हिंदी हैं हम - फोटो : Amar Ujala
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अमर उजाला के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान को पाठकों का भरपूर समर्थन मिल रहा है। हर रोज पाठकों की ओर से कई ई-मेल प्राप्त हो रही हैं, जिनमें से चुनिंदा रचनाओं को प्रकाशित किया जा रहा है। अब भी कई पाठक निर्धारित शब्द सीमा के पार जाकर लिख रहे हैं। आपकी भेजी गई रचनाओं के प्रकाशित होने में शब्द सीमा एक महत्वपूर्ण पैमाना है। इसलिए अपनी रचनाओं को 100 शब्दों के भीतर समेट कर ही भेजें। साथ ही अपनी फोटो भी ई-मेल करें। कई रचनाएं ऐसी भी मिलीं, जिनमें फोटो नहीं थी। ऐसी स्थिति में उन्हें प्रकाशित नहीं किया जा सका। आप अपनी रचनाएं 13 सितंबर तक भेज सकते हैं।

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कोरोना वायरस
(1) चीन से एक आया वायरस, उसका नाम कोरोना
सावधानी नहीं बरती तो पड़ जाएगा रोना
चाइना से आया वायरस
भीड़-भाड़ में मत जाओ
घर का खाना ही खाओ
घर या बाहर कहीं भी जाओ
हाथ साबुन से ही धोना
चाइना से एक आया वायरस
मुंह पर मास्क लगाओ, वायरस दूर भगाओ
छींकते हुए अपने मुंह पर
साफ रुमाल रखो ना
चाइना से आया एक वायरस (कृष्ण राठी, शिक्षक ,मनीमाजरा)


(2) कर दिया सपनों को साकार
नहीं बनाया किसी ने टाटा, बिड़ला, अंबानी
खुद ही बने हैं सब अपने सपनों के सौदागर
राह नहीं थी बनी बनाई, ना ही कोई बड़ा ज्ञानी
सबने करी है कड़ी मेहनत, फिर है मेहनत रंग लाई
एक पल में नहीं बनता सबकुछ
पल-पल मेहनत करके सबने मंजिल है पाई
कल क्या होगा न ध्यान दिया, बस काम किया
राह में मुश्किल उनके भी आई
सुना है उन्होंने भी ताना बाना,
लेकिन फितूर चढ़ा था कुछ पाने का
तोड़ दिया सबका भ्रम, कर दिया सपनों को साकार
ताना देने वालों ने ही हंसकर किया सत्कार  (-प्रीति धीमान, विद्यार्थी, बरवाला)

नादान हूं मैं
(3) नादान हूं मैं, किसी की भी मदद बिना सोचे की कर देता हूं
यह भी नहीं सोचता की इसमें मेरा फायदा है या नुकसान
नादान हूं मैं, सारी दुनिया को एक अच्छी नजर से देखता हूं
सब कहते हैं दुनिया बुरी है, मैं इस बात पर ध्यान ही नहीं देता हूं
अभी इन सबसे अंजान हूं मैं, हां नादान हूं मैं
नादान हूं मैं, खुश रहता हूं हमेशा
हर कोई कहता है, हे भगवान ये कैसी जिंदगी दी है तूने
ये सुन सुन कर परेशान हूं मैं, हां नादान हूं मैं (- हिमांशु रावत, विद्यार्थी, सेक्टर-33 चंडीगढ़)

जल है तो कल है
(4) पानी बचाया जा सकता है लेकिन लोगों के लिए बनाया नहीं जा सका,
वैज्ञानिक तरीकों से बनाना उक्तिसंगत और टेक्नो इकोनॉमिकल भी नहीं
कुतार्किक, आपराधिक और फ्यूजन संशोधित है, दादा जी ने नदी में पानी देखा
पिता जी ने कुएं में देखा, हमने इसे नल में देखा, हमारे बच्चों ने प्लास्टिक बोतल में
अब उनके बच्चे कहां देखेंगे यह विचारणीय है... डे-जीरो की कगार पर है आज देश के 21 शहर 
हम पानी की किल्लत के लिए तीसरा विश्व युद्ध लड़ने जा रहे हैं
अगर आज भी नहीं चेते तो प्यास से कल मरने जा रहे हैं....
प्रदूषण रहित पेय जल की मात्रा हर के नसीब में बस एक चम्मच का वजूद है
(- डा. बासुदेव प्रसाद, पर्यावरण वैज्ञानिक (से.नि.), सीएसआईओ चंडीगढ़)

अर्थ
अर्थ हर बार, हर शब्द का वो नहीं होता जो हम सोचते हैं
एक बिंदी न लगाने पर अर्थ का अनर्थ हो जाता है
कहना कुछ चाहते हैं, पहुंच कहीं जाते हैं
हिंदी भारत मां के विशाल भाल की बिंदी है
भाषा लिखने में रखो पूर्ण ध्यान
केवल बिंदी समझ अर्थ का न करना अनर्थ जनाब (-नीरजा शर्मा)

मेरी कायरता
मैं जानता हूं, मैं मानता हूं, मैं कायर हूं, मैं बुजदिल हूं
क्योंकि हर रोज चोरी लूटमार डकैती सरेआम होती है
पर मेरी आंख जागकर भी सोती हैं
क्योंकि मैं कायर हूं, मैं बुजदिल हूं
शिक्षा के नाम पर लूट ही लूट
रिश्वतखोरी को है यहां पर हर तरफ छूट
दहेज की बलिवेदी पर नारी जली
न्याय की जगह अन्याय की जीत हो जाती है
पर मेरी चेतना दुबक कर सो जाती है
क्योंकि मैं कायर हूं, बुजदिल हूं
हमको वोट दो गरीबी हम मिटा देंगे
हर हाथों को श्रम मुफ्त मकान दिला देंगे
हम सहे जाते हैं, इन छलकपट की बातों में
पर मेरी जुबां कुछ नहीं कह पाती है
क्योंकि मैं कायर हूं, मैं बुजदिल हूं
(-रवि गुप्ता, बैंककर्मी, जीरकपुर)

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