बच्चों के पालन पोषण में माता-पिता के साथ-साथ टीचर की भी अहम भूमिका है। दोनों ऐसे स्तंभ हैं, जिन पर बच्चों का भविष्य टिका है। एक अच्छा टीचर मिलने के बाद बच्चों की दुनिया बदल जाती है। भविष्य संवर जाता है। अमर उजाला की ‘परवरिश की पाठशाला’ दूसरी सीरीज में बच्चों के पालन-पोषण में टीचर की भूमिका का मुद्दा रखा गया है। इसमें एक्सपर्ट बता रहे हैं कि किस तरह से पेरेंट्स और टीचर के तालमेल से बच्चों के भविष्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। पेरेंट्स और टीचर के बीच संवाद कैसा होना चाहिए। दोनों के बीच कहां कमी रह गई है। इन सभी बिंदुओं पर एक्सपर्ट ने विस्तार से बातचीत की।
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पेरेंट्स करें टीचर की इज्जत
मोहाली स्थित फोर्टिस मोहाली के सीनियर कंसलटेंट डॉ. हरदीप सिंह ने बताया कि टीचर के प्रति न सिर्फ बच्चों का बल्कि पेरेंट्स का भी रवैया बदल गया है। अक्सर पेरेंट्स बच्चों के सामने ही उनके टीचर को भला-बुरा कहते हैं। यदि टीचर बच्चे की कमी निकाल दें तो पेरेंट्स बच्चों को समझाने के बजाए टीचर को सुनाने लगते हैं। इससे न सिर्फ बच्चे पर बुरा प्रभाव पड़ता है बल्कि टीचरों में भी बदलाव आया है। वे अब बच्चों की कमियां बताने से कतराने लगे हैं।
इस समस्या का हल भी पेरेंट्स के पास है। सबसे पहले पेरेंट्स टीचर को सम्मान दें। बच्चों को गुरु की भूमिका के बारे में बताएं। उन्हें गुरु के स्थान के बारे में बताएं। उन्हें यह भी जानकारी दें कि जब पेरेंट्स स्कूल जाते थे तो वे किस तरह से अपने टीचर को सम्मान देते थे। उनके कैरियर में टीचर का कितना अहम योगदान रहा है। जाहिर सी बात है कि जब पेरेंट्स सम्मान देंगे तो बच्चों में भी आदर भाव बढ़ेगा।
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पेरेंट्स मीट कभी मिस न करें
परवरिश की पाठशाला
- फोटो : File Photo
पेरेंट्स मीट कभी मिस न करें
डॉ. हरदीप का मानना है कि स्कूलों में होने वाली पेरेंट्स मीट में अक्सर पेरेंट्स नहीं जाते हैं। यदि जाते हैं तो दोनों में से एक जाएगा। कभी मां चली गई तो कभी पिता, जबकि पेरेंट्स मीट को गंभीरता से लेना चाहिए।
पेरेंट्स मीट जाएं और बच्चे के बारे में खुलकर बात करें। यदि टीचर बच्चे की कोई कमी बताता है तो उसे सकारात्मक रूप से लें। ऐसा बिल्कुल न करें कि स्कूल से घर लौटते बच्चे को भला-बुरा कहने लगे। डांटने या पीटने लगे। इससे बच्चा और बिगड़ जाएगा। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चे से होमवर्क और पढ़ाई के अलावा उसकी रुचियों के बारे में जानें। ज्यादा से ज्यादा वक्त उनके साथ बिताएं और उसकी अच्छी आदतों के प्रति उसे उत्साहित करें। ऐसा माहौल बनाएं, जिससे अपने बच्चे की कभी जासूसी न करने पड़े।
टीचर-पेरेंट्स नैतिक मूल्यों का भी पाठ पढ़ाएं
पंजाब यूनिवर्सिटी के समाज शास्त्र प्रोफेसर कुमोल अबी के मुताबिक स्टूडेंट और टीचर के बीच जो गुरु और शिष्य वाली परंपरा थी, वह खत्म हो चुकी है। शिक्षकों का जो प्रभाव और स्टेटस समाज में था, वह खो गया है। इंटरनेट के गलत इस्तेमाल ने बच्चों की सोच को काफी प्रभावित किया है और उन्हें असुरक्षित महसूस कराया है। यही कारण है कि बच्चों को अब पुराने तौर तरीकों से परहेज है, जो कभी बगैर किसी संकोच के इस्तेमाल किए जाते थे। इसके लिए टीचर और पेरेंट्स दोनों को चाहिए कि बच्चे पर बजाय किताबी बोझ थोपने के उन्हें ज्यादा से ज्यादा नैतिक मूल्यों के बारे में बताएं।
मोबाइल के बजाय बच्चों के साथ समय बिताएं
पंजाब यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्र डिपार्टमेंट के प्रोफेसर मनजीत के मुताबिक किसी भी व्यक्ति में नैतिकता पहले उसके परिवार और फिर धर्म से आती है, लेकिन मौजूदा हालात में दोनों ही जगह दिक्कत है। धर्म के नाम पर जहां कुछ और ही परोसा जा रहा है, वहीं परिवार एकल हो गए हैं।
मां-बाप के पास ही अपने बच्चों के लिए समय नहीं है। क्योंकि समाज में पैसा कमाने की होड़ मची है। अगर हमारी मौजूदा और आने वाली जेनरेशन को बचाना है तो सबसे पहले बच्चों के परिजनों को खुद में सुधार लाना चाहिए। आजकल पेरेंट्स मोबाइल पर ही लगे रहते हैं। बच्चों के साथ समय गुजारें और उनकी बात सुनें। जब बड़े सुधरेंगे तो बच्चों में भी अच्छे संस्कार आएंगे।
टीचर का कैसा होना चाहिए रोेल
टीचरों को पढ़ाई के साथ-साथ नैतिक मूल्यों पर भी बात करनी चाहिए। हर बच्चा एक जैसा नहीं होता है। यदि कोई बच्चा कमजोर है तो उसे सबके सामने डांटने के बजाए उसे प्यार से समझाएं। जब पेरेंट्स से बात करें तो बच्चे की कमी को संतुलित तरीके से बताएं। बच्चे में कोई न कोई अच्छाई भी होगी। अच्छी बातों के साथ उसकी कमियों के बताएं, ताकि पेरेंट्स का भी उत्साह बढ़े। सबके सामने भला-बुरा कहने और पेरेंट्स से सीधे शिकायत करने पर बच्चे के आत्मसम्मान पर प्रभाव पड़ सकता है। पेरेंट्स भी बार-बार टीचर से शिकायत न करें।