क्या है मर्ज, आप भी जान लें
थैलेसीमिया रोग एक तरह का रक्त विकार है। इसमें बच्चे के शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण सही ढंग से नहीं हो पाता है। इन कोशिकाओं की आयु भी बहुत कम हो जाती है। इस कारण इन बच्चों को हर 21 दिन बाद कम से कम एक यूनिट रक्त की जरूरत होती है।
थैलेसीमिया एक वंशानुगत रोग है। अगर माता या पिता किसी एक में या दोनों में थैलेसीमिया के लक्षण हैं तो यह रोग बच्चे में जा सकता है इसलिए बेहतर होता है कि बच्चा प्लान करने या शादी से पहले ही अपने जरूरी मेडिकल टेस्ट करा लेने चाहिए।
माता-पिता दोनों को ही यह रोग है लेकिन दोनों में माइल्ड (कम घातक) है तो बच्चे को थैलेसीमिया होने की आशंका बहुत अधिक होती है। साथ ही बच्चे में यह रोग गंभीर स्थिति में हो सकता है, जबकि माता-पिता में रोग की गंभीर स्थिति नहीं होती है।
माता-पिता दोनों में से किसी एक को यह रोग है और माइल्ड है तो आमतौर पर बच्चों में यह रोग ट्रांसफर नहीं होता है। यदि हो भी जाता है तो बच्चा अपना जीवन लगभग सामान्य तरीके से जी पाता है। कई बार तो उसे जीवनभर पता ही नहीं चलता कि उसके शरीर में कोई दिक्कत भी है।
आंकड़े बयां कर रहे बदलाव की बयार
2016 से 19 के बीच ट्राइसिटी में पांच थैलेसीमिक बच्चों ने जन्म लिया था। इसमें से तीन बच्चे पंचकूला, एक मोहाली और एक चंडीगढ़ का है। चंडीगढ़ में पंजीकृत बच्चे का जन्म 2019 में हुआ था, जबकि मोहाली में 2018 और पंचकूला में 2019 में दो व 2020 में एक बच्चे ने जन्म लिया था।
2019 से 2022 सितंबर के बीच ट्रस्ट में पांच बच्चों को पंजीकृत किया गया है। उनमें से एक बच्चा चंडीगढ़ और मोहाली व पंचकूला के दो-दो हैं। चंडीगढ़ वाले बच्चे की जन्मतिथि 2019, पंचकूला के क्रमश: 2020 और 2021 व मोहाली के क्रमश: 2020 व 2021 है।
थैलेसीमिया को समाप्त करने के लिए ट्रस्ट के सदस्य 38 साल से लगातार प्रयास कर रहे हैं। अस्पताल, स्कूल-कॉलेज, सार्वजनिक स्थानों पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। गर्भावस्था के दौरान एचपीएलसी टेस्ट अनिवार्य कर दिया गया है। इससे गर्भ में ही बच्चे की स्क्रीनिंग कर ली जाती है। वहीं शादी से पहले मेडिकल कुंडली मिलवाने वाले युवाओं की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। जागरूकता का ही परिणाम है तो पिछले तीन वर्षों के दौरान चंडीगढ़ में एक भी थैलेसीमिक बच्चे का जन्म नहीं हुआ। राजिंदर कालरा, सदस्य सचिव, थैलसेमिक चैरिटेबल ट्रस्ट, चंडीगढ़।