चंडीगढ़। बच्चे की आवाज पर प्रतिक्रिया न देना या सुनने में देरी को सामान्य समझकर टालना भारी पड़ सकता है। सुनने की क्षमता में कमी का असर बच्चे के बोलने, भाषा सीखने और समग्र विकास पर पड़ सकता है। इसी दिशा में पीजीआई के ईएनटी विभाग ने सात महीने के बच्चे के दोनों कानों में एक साथ कॉक्लियर इंप्लांट कर महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इसे देश में रिपोर्ट किए गए सबसे कम उम्र के ऐसे मामलों में शामिल बताया गया है।
सर्जरी प्रो. रामदीप सिंह विर्क के नेतृत्व में की गई। ऑडियोलॉजी और पुनर्वास टीम में प्रो. संजय मुंजाल, डॉ. पारुल सूद, डॉ. अनुराधा और श्री द्रेपथ शामिल रहे। एनेस्थीसिया की जिम्मेदारी डॉ. नितिका बंसल ने संभाली। ईएनटी रेजिडेंट डॉ. अनुप्रिया, डॉ. भीषम और डॉ. नारायण ने सहयोग किया। ऑपरेशन थिएटर में तकनीकी सहयोग श्री साही राम और सुश्री शिवनूर गिल ने दिया।
विशेषज्ञों ने कहा कि शिशुओं और छोटे बच्चों में सुनने की समस्या को विकास से जुड़ी गंभीर स्थिति के रूप में देखना चाहिए। समस्या दिखाई नहीं देती, लेकिन इलाज में देरी का असर बोलने, भाषा और सीखने की क्षमता पर पड़ सकता है। पीजीआई ने अभिभावकों से बच्चों की सुनने की क्षमता की समय पर जांच कराने की अपील की। जरूरत पड़ने पर सटीक निदान, समय पर कॉक्लियर इंप्लांट और नियमित श्रवण पुनर्वास से बच्चे की संवाद क्षमता को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।