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MSME के दम पर चीन को टक्कर दे रहा हरियाणा का जूता

Mon, 18 Jan 2016 01:14 PM IST
शील भारद्वाज/अमर उजाला, बहादुरगढ़
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हरियाणा के एनसीआर में फुटवियर उद्योग तेजी से पांव जमा रहा है और बहादुगरढ़ तो इस उद्योग का हब बन चुका है। यहां की इकाइयां आज प्रदेश के औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। करीब 25 हजार करोड़ रुपये के टर्नओवर वाले बहादुरगढ़ के जूता उद्योग को और विस्तार की विपुल संभावनाएं हैं, लेकिन कुछ समस्याएं भी हैं।
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अकेले एचएसआईआईडीसी द्वारा विकसित औद्योगिक क्षेत्र में ही पिछले वर्षों में करीब चार हजार करोड़ रुपये का निवेश हुआ है। 2800 से ज्यादा औद्योगिक इकाइयों वाले बहादुरगढ़ में करीब 700 तो फुटवियर यूनिट हैं। यहां देश के पहले फुटवियर पार्क में ही 300 से ज्यादा जूता इकाइया हैं। ज्यादातर माइक्रो, स्माल और मीडियम इकाइयां हैं। ये कम कीमत वाले जूते चप्पल बनाती हैं जो टैक्स फ्री हैं।

वैसे एक्शन, रिलेक्सो, एरोबाक, टुडे व सुमंगलम फुटवियर जैसे बड़े नाम भी बहादुरगढ़ की देन हैं। बहादुरगढ़ के जूता उद्योग के सामने लेबर जुटाना बड़ी समस्या है। इसके लिए कुशल कारीगरों की जरूरत होती है। दिल्ली से हजारों श्रमिक हर रोज बहादुरगढ़ आते हैं। इनको लाने ले जाने के लिए उद्यमियों को हर रोज बसें लगानी पड़ता हैं, जो उन्हें काफी महंगा पड़ता है।
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बहादुरगढ़ के जूता निर्माताओं को ट्रांसपोर्ट की सही सुविधा नहीं मिल रही। अधिकतर जूता इकाइयां दिल्ली के ट्रासपोर्टरों को माल भेजती हैं। दिल्ली में ट्रांसपोर्टर तक माल को पहुंचाने के लिए निर्माताओं को बॉर्डर पर 700 से 1300 रुपये तक प्रति राउंड ग्रीन टैक्स देना पड़ता है, इससे लागत बढ़ती है। जूतों की अपर सिलाई का काम गली-कूचों और सूक्ष्म इकाइयों में होता है।

जो सूक्ष्म इकाइयां ये जॉब वर्क करती हैं, उन्हें कराधान विभाग का काफी औपचारिक पेपरवर्क करना पड़ता है। जूतों के अपर सिलाई मटीरियल पर टैक्स से ये परेशान हैं। इससे लागत भी बढ़ती है। खपत के हिसाब से और सरचार्ज मिलाकर इन उद्योगों को बिजली करीब 10 रुपये यूनिट पड़ती है। इससे उत्पादन महंगा होता है और कंपटीशन के इस दौर में व्यावहारिक कीमत रख पाना मुश्किल होता है।

नई इकाई लगाने और पुरानी के विस्तार व संचालन के लिए कर्ज की जरूरत पड़ती है, लेकिन कर्ज मिलना बहुत मुश्किल है। पहले हुडा या एचएसआईआईडीसी से अनुमति लेनी पड़ती है। इसके लिए कोलेटेरल सिक्योरिटी देनी पड़ती है। बैंक आवेदक से मकान, दुकान या जमीन गिरवी मांगते हैं। ब्याज भी भारी भरकम रहता है। प्राइवेट फाइनेंसर कमरतोड़ ब्याज लेते हैं।

इस तरह उद्योग स्थापना व संचालन दोनों के लिए धन की व्यवस्था करने में उद्यमियों को कठिनाई आती है। उद्यमियों को कर्ज लेना आसान करने व उसको समय से लौटाने के लिए सरकार विशेष प्रयास करके ब्याज की दरें कम कर सकती है। स्थायी संपत्ति गिरवी रखे बिना साधारण डीपीआर पर कर्ज देने की व्यवस्था की जानी चाहिए। उद्योगों पर तरह-तरह के कर होना उद्यमियों के लिए सबसे बड़ी समस्या है। इसी वजह से फैक्ट्रियों में इंस्पेक्टर आ धमकते हैं।

करों के झमेले में फंसे रहने से प्रबंधन का कीमती वक्त नष्ट होता है। उद्यमियों पर कई विभागों की नकेल रहती है। वे कागजी कार्रवाई में उलझे रहते हैं। आर्थिक मार ज्यादा होती है, जो उनके लिए तनाव का भी कारण बनता है और प्रोडक्टिविटी सीधी प्रभावित होती है। जीएसटी लागू हो जाए तो उद्यमियों को बड़ी राहत मिल सकती है। यह प्रणाली उन्हें करों की विविधता से बचा सकती है। इंस्पेक्टरी राज से भी छुटकारा मिल सकता है।

अर्थ व्यवस्था में मंदी की वजह से उद्योगों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। ग्राहक की स्थिति मजबूत नहीं होने से उद्योगों में पूरा उत्पादन नहीं हो रहा। उद्योग उत्पादन बढ़ाएं भी तो किसके लिए। खरीदार की कमी है। इकाइयों को अपने खर्च में कटौती करनी पड़ रही है। मैन पावर भी घटानी पड़ती है। एचएसआईआईडीसी के औद्योगिक क्षेत्र में फायर ब्रिगेड की सुविधा न होने से यहां के जूता उद्योग मालिकों को चिंता रहती है।

सेक्टर-17 में सैकड़ों जूता इकाइयां हैं। इन उद्योगों में रबड़ व केमिकल आदि ज्वलनशील पदार्थों का इस्तेमाल होता है। चूक होने पर आग लगने की आशंका रहती है, लेकिन फायर स्टेशन नहीं है। फायर ब्रिगेड को रेलवे रोड व रोहतक रोड पर भीड़ भरे बाजार से होकर आना पड़ता है। कई बार रास्ते में जाम लगा रहता है। जूता उद्योगों और दूसरी औद्योगिक इकाइयों में 40 हजार से ज्यादा ऐसे श्रमिक काम करते हैं जो ईएसआइ के रोल पर हैं, लेकिन यहां ईएसआई अस्पताल नहीं है।

बीमार होने पर श्रमिकों को पहले ईएसआई डिस्पेंसरी जाना पड़ता है। इसके बाद डाक्टर की मेहरबानी हो जाए तो उसे दिल्ली के बसई दारापुर में स्थित ईएसआई अस्पताल रेफर किया जाता है। बहादुरगढ़ में ईएसआई अस्पताल न होने से श्रमिकों को तो परेशानी होती ही है, उद्योगों का काम भी प्रभावित होता है।

क्या कहते हैं उद्यमी
जूता उद्योग श्रमिक आधारित उद्योग है, लेकिन सरकार ने श्रमिकों के न्यूनतम वेतन में एक ही बार में 23-24 फीसद बढ़ोतरी करके हम लोगों को संकट में डाल दिया है। न्यूनतम वेतन इसी तरह बढ़ाए गए तो उद्योग चलाना मुश्किल हो जाएगा।
-अनिल गुप्ता, वरिष्ठ उपाध्यक्ष, फुटवियर निर्माता एसोसिएशन

बहादुरगढ़ में जूता उद्योग के लिए लेबर मिलना मुश्किल हो रहा है। हमें दिल्ली से लेबर लानी पड़ती है। सरकार को बहादुरगढ़ में सस्ते फ्लैट बनाने चाहिए ताकि हमारे श्रमिक दिल्ली के बजाय बहादुरगढ़ में ही रह सकें।
-सुभाष जग्गा, महासचिव, फुटवियर निर्माता एसोसिएशन

सरकार अगर सूक्ष्म व लघु उद्यमियों को सपोर्ट करे तो बहादुरगढ़ का जूता उद्योग तरक्की करेगा और चीन से जूता आयात करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हम अधिक अच्छी क्वालिटी का जूता बनाएंगे। बहादुरगढ़ में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। अपर मेटीरियल को कर मुक्त करने की जरूरत है।
-नरेंद्र छिकारा, महासचिव, बीसीसीआई

हमें यहां सुविधाएं कम मिलती हैं। बिजली ज्यादा महंगी मिल रही है और ट्रांसपोर्ट भी सुलभ नहीं है। दिल्ली की तरह बिजली महंगी है तो हरियाणा सरकार को दिल्ली की तर्ज पर सुविधाएं भी देनी चाहिए। हमें ट्रांसपोर्ट यूनियनों की जबरदस्ती से मुक्ति की जरूरत है।
-कमल किशोर, रेशमा फुटवियर्स

जीएसटी लागू हो जाए तो उद्योगों के लिए संजीवनी का काम करेगा। उद्यमियों को अधिक सरकारी विभागों के मकड़जाल से भी बचाना जरूरी है।
-विपिन बजाज, पूर्व अध्यक्ष, बीसीसीआई

जीएसटी लागू हो जाए तो उद्योगों के लिए संजीवनी का काम करेगा। उद्योगों की भलाई के लिए विपक्षी दलों को भी संसद में यह प्रस्ताव पास करने में सरकार की मदद करनी चाहिए। उद्यमियों को सरकारी विभागों के मकड़जाल से भी बचाना जरूरी है।
-सुशील गोयल, पूर्व अध्यक्ष, बीसीसीआई

उद्योगों के लिए कर देने के नियम सरल करने होंगे। जब तक हमारे लिए पूंजी की उपलब्धता आसानी से सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक ज्यादा नए उद्योगों की स्थापना नहीं होगी और बहादुरगढ़ इलाके में पुरानी इकाइयों का विस्तार नहीं होगा।
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-अशोक रेढ़ू, पूर्व अध्यक्ष, बीसीसीआई
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