"एक लरज़ता नीर था, वह मर के पत्थर हो गया
दूसरा इस हादसे से, डर के पत्थर हो गया
तीसरा इस हादसे को, करने लगा था बयां
वह किसी पत्थर की घूर से डर के पत्थर हो गया
एक शायर बचा रहा, संवेदनों संग लरज़ता
इतने पत्थर कि वो तो गिनती करके ही पत्थर हो गया।"
ये पंक्तियां हैं पंजाबी के प्रसिद्ध शायर पद्मश्री सुरजीत पातर की। जो लिखा वो सराहा गया और अब वह कवियों के लिए मील का पत्थर बन गया। वह अपने शब्दों के माध्यम से अपने सामाजिक दायित्व को बेहद संवेदनशीलता और खूबसूरती से निभा रहे हैं। उनकी कविताओं, गजलों, गीतों में गज़ब का धैर्य और जज़्बात उलझे मन को भी थाम लेता है। सुरजीत पातर शुक्रवार को चंडीगढ़ के प्रेस क्लब में युवा कवि दीपक शर्मा की किताब के विमोचन के मौके पर पहुंचे थे।
सौम्य स्वभाव और शायर जुबां से उन्होंने युवा कवि दीपक शर्मा की कविताओं को सिर्फ सराहा ही नहीं, संदेश भी दे डाला कि कविताओं की रचना होती रहनी चाहिए। दिल के अंदर के तूफान हो या क्रियाशीलता...सब कुछ बाहर आना चाहिए। कविताएं तो बदलाव, सामाजिक चेतना की माध्यम हैं।
उन्होंने दीपक शर्मा की किताब ‘तूफान’ की एक कविता मां तू कब बीमार होगी... पर कहा कि यह कविता टूटते और बिखरते रिश्तों को जोड़ती मां की कहानी है। जिसमें मां की बीमारी पर सारे कुटुंब के इकट्ठा होने से परिवार में खुशी बिखरती है। परिवार में सांझा चूल्हा जलता है और पिता के चेहरे पर नाती, पोतों को देखकर चमक आती है।
सुरजीत पातर ने कहा कि ऐसा नहीं है कि युवा कवि या लेखकों की कमी है। पाठक कम हो रहे हैं। बेशक युग डिजिटल हो गया हो, पर किताब का महत्व कम नहीं होना चाहिए। क्योंकि, किताबें पढ़ने से शब्दकोश बढ़ता है, ज्ञान गंगा बहती है।
उन्होंने कहा कि पंजाब के प्रसिद्ध रंगकर्मी गुरशरण सिंह को देखें, उनके नाटकों ने गांव-गांव में जागरूकता फैलाई। ऐसे ही कवि और लेखक का काम समाज को नई दिशा देना है। कई बार ऐसा लगता है कि समाज के लोगों को लाचारी दिखाई जा रही है, जबकि वास्तविकता में ऐसा नहीं है।
दीपक शर्मा की पहली काव्य पुस्तक है ‘तूफान’
पंजाबी लेखक सभा चंडीगढ़ द्वारा प्रेस क्लब में दीपक शर्मा चनारथल की जिस किताब ‘तूफान’ का विमोचन किया गया, वह शर्मा की पहली काव्य पुस्तक है। साहित्यकार पद्मश्री सुरजीत पातर ने इसका विमोचन किया।