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हाईकोर्ट ने कहा, अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए विवाहित बेटी भी हकदार

Sun, 19 Jul 2020 02:19 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, चंडीगढ़

सार

  • लिंग के आधार पर वैवाहिक स्थिति को लेकर नहीं किया जा सकता नागरिकों से भेदभाव
  • विवाह के बाद यदि लड़का परिवार का हिस्सा रहता है तो लड़की भी उसी परिवार का हिस्सा
  • हाई कोर्ट ने मृतक कर्मचारी की विवाहित बेटी को नौकरी देने के दिए आदेश
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हाईकोर्ट - फोटो : SELF
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विस्तार
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि यदि विवाहित बेटा अनुकंपा के आधार पर नौकरी का हकदार है तो विवाहित बेटी को इस अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता। हाई कोर्ट ने मृतक कर्मचारी की विवाहित बेटी को एक माह में नौकरी पर रखने के पंजाब सरकार को आदेश दिए हैं।
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मृतक कर्मचारी की बेटी अमरजीत कौर ने याचिका दाखिल करते हुए बताया कि 2004 में उसका विवाह हुआ था और वह तब से अपने पति व बच्चों को लेकर अपने मां बाप के साथ रह रही थी। याचिकाकर्ता ने बताया कि वह अपने मां-बाप की इकलौती संतान थी इसलिए सेवा के उद्देश्य से ऐसा कर रही थी। 

पूरे परिवार में उनके पिता ही कमाई का जरिया थे जो पंजाब पुलिस में कार्यरत थे। 2008 में ड्यूटी के दौरान हार्टअटैक से उनकी मौत हो गई थी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए आवेदन किया था। 2009 में तरनतारन सीआईडी की ओर से रिपोर्ट देते हुए बताया गया कि परिवार के पास आमदनी का कोई जरिया नहीं है और केवल 1 एकड़ खेती की भूमि है। 
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बावजूद इसके 15 अप्रैल 2015 को पंजाब के डीजीपी ने आवेदन को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि विवाहित बेटी को अनुकंपा के आधार पर नौकरी नहीं दी जा सकती। इस फैसले को याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि संविधान में सभी को बराबरी का अधिकार है और यदि विवाहित लड़का अनुकंपा के आधार पर नौकरी का हकदार है तो विवाहित लड़की को इस अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता।

 इसके साथ ही हाई कोर्ट ने कहा कि यह आम धारणा बनी हुई है कि विवाह के बाद लड़की की जिम्मेदारी पति की होती है और वह पिता पर आश्रित नहीं होती। हाई कोर्ट ने कहा कि यदि विवाह के बाद बेटा पिता पर आश्रित की श्रेणी में आता है तो बेटी भी समानता के अधिकार के तहत उसी श्रेणी में आती है। 

संविधान में समानता का अधिकार हर नागरिक को दिया है जिससे किसी को वंचित नहीं रखा जा सकता। लिंग के आधार पर और वैवाहिक स्थिति के आधार पर किसी से भेदभाव करना संविधान के खिलाफ है।
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