22 वर्षों के संघर्ष का मिला फल
डॉ. राजकुमार मणी ने बताया कि 22 वर्षों से इस पर काम कर रहा हूं। ये उन मरीजों के लिए महत्वपूर्ण है जो गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं। इंडियन सोसाइटी ऑफ क्रिटिकल केयर मेडिसिन के अध्यक्ष के तौर पर डॉ. राजकुमार ने 2005 में पहली गाइडलाइन बनाई। जो मेडिकल और एथिकल साइड पर आधारित थी लेकिन वो लागू नहीं हो पाया। उसे 2012 और 2014 में अपडेट किया गया। कुछ डॉक्टर इसे फॉलो करने लगे। लेकिन ज्यादातर इसे लेकर भ्रम की स्थिति में थे। 2018 में कोर्ट ने इसमें महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उन्होंने इसे उचित और कानूनी मान लिया। इसके बाद ही विल यानि वसीयत बनाने की भी अनुमति मिली। लेकिन उस समय भी प्रक्रिया जटिल मानी जा रही थी। उसके बाद उसके सरलीकरण के लिए 2019 में अपील की गई। जनवरी 2023 में हमारे पक्ष में निर्णय सुनाया गया।
डॉक्टरों की कमेटी प्रत्येक अस्पताल में
डॉ. राजकुमार ने बताया कि इसके लिए प्रत्येक अस्पताल में प्राइमरी और सेकेंडरी दो बोर्ड स्थापित होती है। जिसमें दो-दो डॉक्टर और दो गवाह होते हैं। उनमें से एक डॉक्टर सीएमओ इनपैनल्ड होना चाहिए। उस बोर्ड की देखरेख में ऐसे मरीजों के इलाज की प्रक्रिया आगे जारी करने से संबंधित निर्णय लिया जाना है। यह वसीयत न होने पर भी मरीज और उसके परिजन के निर्णय को समर्थन देगी। इनका मुख्य उद्देश्य लामा की स्थिति पर काबू पाना है।
डॉ. राजकुमार का कहना है कि जिन मरीजों पर व्यर्थ रूप से दवाईयां और लाइफ सेविंग तकनीक का प्रयोग किया जाता है। उन मरीज के परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ाता है। उन मरीजों की मौत आईसीयू में होना उचित नहीं है। उस मरीज का अधिकार है कि वह अंतिम सांस परिवार के साथ ले। परिवार के पास चुनाव का विकल्प नहीं होता। डॉक्टर दो-चार प्रतिशत चांस बोलकर मरीज को आईसीयू में रखे रहते हैं। इस स्थिति में मरीज के परिजन लामा जिसे लेफ्ट अगेंस्ड मेडिकल एडवाइज कहा जाता है की प्रक्रिया अपनाते हैं। इससे मरीज की मौत और दर्दनाक हो जाती है। इसे कम करने का प्रयास होना चाहिए। इसलिए यह कानून बेहद महत्वपूर्ण है।