ब्लड कैंसर से जंग में बच्चों को नई उम्मीद
पीजीआई में बच्चों के ब्लड कैंसर की सर्वाइवल दर 35% से बढ़कर 80% हुई
समय पर जांच, बेहतर इलाज और देखभाल से बढ़ी जिंदगी की उम्मीद
फोकोन-2026 में देश-विदेश के 400 से अधिक विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव
माई सिटी रिपोर्टर
चंडीगढ़। बच्चों में कैंसर का पता चलने पर परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनके जीवन को बचाने की होती है। हालांकि, समय पर बीमारी की पहचान और बेहतर उपचार से अब उम्मीद बढ़ी है। पीजीआई में खून के कैंसर एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (एएलएल) से पीड़ित बच्चों के लंबे समय तक जीवित रहने की दर 1997 में करीब 35 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर लगभग 80 प्रतिशत हो गई है। यह जानकारी पीजीआई में आयोजित 29वें राष्ट्रीय बाल रक्त रोग एवं कैंसर सम्मेलन फोकोन-2026 में साझा की गई।
उपचार के लिए सहयोग थीम पर आयोजित सम्मेलन का उद्घाटन पीजीआई के डीन (एकेडमिक्स) प्रो. संजय जैन ने किया। आयोजन अध्यक्ष प्रो. अमिता त्रेहान ने कहा कि बच्चों के कैंसर के बेहतर इलाज के लिए डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के बीच तालमेल जरूरी है। समय पर जांच, संक्रमण से बचाव, उचित पोषण और उपचार के दौरान लगातार निगरानी से भी बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। सम्मेलन में 400 से अधिक चिकित्सकों और प्रतिनिधियों के साथ 140 से ज्यादा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं। इनमें अमेरिका और कनाडा के 11 विशेषज्ञ भी शामिल हैं।
आधुनिक तकनीकों से इलाज को बेहतर बनाने पर जोर
सम्मेलन में कार-टी सेल थेरेपी, बोन मैरो ट्रांसप्लांट और नई कैंसररोधी दवाओं पर चर्चा की गई। कार-टी सेल थेरेपी में मरीज की प्रतिरक्षा कोशिकाओं को विशेष तरीके से तैयार किया जाता है, ताकि वे कैंसर कोशिकाओं को पहचानकर उन पर हमला कर सकें। विशेषज्ञों ने जटिल मामलों में आधुनिक उपचार को भारतीय बच्चों के लिए सुलभ और किफायती बनाने पर जोर दिया।
हर साल 10 से 15 हजार बच्चे थैलेसीमिया मेजर के साथ जन्म लेते हैं
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में हर साल अनुमानित 10 से 15 हजार बच्चे थैलेसीमिया मेजर के साथ जन्म लेते हैं। इसकी रोकथाम के लिए गर्भावस्था से पहले जांच, बीमारी के वाहक की पहचान और आनुवंशिक परामर्श को जरूरी बताया गया। सम्मेलन में बच्चों के पोषण, संक्रमण से बचाव और कैंसर उपचार के दौरान नर्सिंग देखभाल पर विशेष कार्यशालाएं भी आयोजित की गईं। विशेषज्ञों ने कहा कि समय पर पहचान, सही उपचार और बेहतर देखभाल से बच्चों के ठीक होने की संभावना बढ़ सकती है।