हरियाणा के कैथल में महिला विंग की पहली महापंचायत हुई, जिसमें महिलाओं ने राजनीतति ने प्रतिनिधित्व की मांग की। देश में आजादी के बाद से महिलाओं की समानता और उनकी सभी स्तरों पर भागीदारी की मांग तो अनेक बार उठी मगर इस दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई। यह कहना है सर्वखाप महापंचायत की महिला विंग की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संतोष दहिया का। वे रविवार को कैथल के माणस गांव में आयोजित पहली महिला महापंचायत को संबोधित कर रही थी।
महापंचायत में निर्णय लिया गया कि देश के सभी सांसदों, विधायकों और सामाजिक संस्थाओं से इस मुद्दे पर समर्थन जुटाने के बाद प्रधानमंत्री से मिलकर राजनीति में महिलाओं की 50 प्रतिशत भागीदारी की मांग की जाएगी। राष्ट्रपति द्वारा देश की सशक्त महिला के रूप में सम्मानित हो चुकी डॉ. संतोष दहिया ने कहा कि सत्ता में महिलाओं की भागीदारी के संबंध में एक रिपोर्ट के अनुसार भारत का स्थान 103वां है। इस मामले में अफ्रीका के सबसे ग़रीब और पिछड़े समझे जाने वाले कई मुल्क भी हमसे आगे हैं।
तमाम प्रयासों और दबाओं के बावजूद सांसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण विधेयक पारित नहीं हो सका है। लेकिन स्थानीय निकायों में महिलाओं को मौके मिल सके हैं। वर्ष 1956 में मेहता समिति की सिफारिशों के आधार पर त्रि-स्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था लागू हुई थी। लेकिन पंचायतों में महिलाओं की एक तिहाई भागीदारी 1992 में 73वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम पारित होने के बाद ही सुनिश्चित हो सकी। निश्चित रूप से 73वां संवैधानिक संशोधन महिलाओं के सशक्त भागीदारी की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हुआ है।
नहीं पर्याप्त प्रतिनिधित्व
आधी आबादी को पंचायत स्तर पर केवल 33 प्रतिशत हिस्सा ही मिला है। एक कड़वी सच्चाई यह है कि करीब तीन दशक से संसद और विधायिका में महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया है और सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में उन्हें आबादी अनुसार भागेदारी नहीं दी गई।
स्वयं को साबित किया
रानी लक्ष्मी बाई, कल्पना चावला, सायना नेहवाल, ममता बनर्जी, समेत जब कभी भी महिलाओं को आगे आने का मौक़ा मिला है, उन्होंने अपने आप को साबित किया है। इस दौरान उनका सशक्तिकरण तो हुआ ही है, उन्होंने सदियों से चले आ रहे भ्रम को भी तोड़ा है कि महिलायें पुरुषों के मुकाबले कमतर होती हैं और वे पुरुषों द्वारा किये जाने वाले कामों को नहीं कर सकती हैं।
मिले बराबरी का अधिकार
लोकतांत्रिक और सामाजिक व्यवस्था में गैर–बराबरी कायम है। निश्चित रूप से अभी भी महिलाओं को उनके राजनीतिक सशक्तिकरण की सफर में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। दहिया ने मांग उठाई कि लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए। पंचायत स्तर पर भी आरक्षण 33 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत किया जाना चाहिए।
परिमाणात्मक सुधार हों
निर्वाचित हो जाने के बाद भी महिलाओं को लिंग आधारित भेदभाव, जातिगत भेद, निम्न और दूसरी पारम्परिक और गैरबराबरी आधारित सामाजिक संरचनाओं से जूझना पड़ता है। माणस पट्टी से मुकेश देवी और माणस गांव की सरपंच रुपेश देवी ने भी उनकी इस मुहिम को सराहते हुए कहा कि महिलाओं की भागीदारी से न सिर्फ विकास के काम होंगे बल्कि समाज को नयी दिशा मिलेगी।
महिलाओं ने बताई समस्याएं
देश की पहली महापंचायत में महिलाओं ने अपनी समस्याएं भी बताई। बुजुर्ग महिलाओं ने जहां आयु प्रमाण पत्र के अभाव में पेंशन नहीं बनने की शिकायत की। वहीँ अधिकांश महिलाओं ने शराब बिक्री पर रोक के लिए आवाज उठाई। बीए फाइनल की छात्रा ममता ने सुरक्षा, परिवहन, उच्च स्तरीय शिक्षा उपलब्ध कराने की मांग की। संतोष दहिया ने खेल में पदक विजेता छात्राओं को भी सम्मानित किया।