मालवा इलाके में एक बार फिर तीन दिग्गज सियासी परिवारों की प्रतिष्ठा लोकसभा चुनाव में दांव पर होगी। वहीं आप के लिए भी यहां अपना वजूद कायम रखने की चुनौती रहेगी। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्नी व पूर्व केंद्रीय मंत्री परनीत कौर पटियाला लोकसभा क्षेत्र, पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की पुत्रवधू व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल बठिंडा लोकसभा क्षेत्र तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री व पद्म भूषण अवॉर्डी सुखदेव सिंह ढींढसा के बेटे व पूर्व वित्त मंत्री परमिंदर सिंह ढींढसा संगरूर लोकसभा सीट से संभावित प्रत्याशी माने जा रहे हैं।
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हालांकि सियासी रुतबा रखने वाले इन परिवारों के सदस्यों को औपचारिक तौर पर अभी प्रत्याशी घोषित नहीं किया गया है, लेकिन इनका चुनाव लड़ना तय माना जा रहा है। पिछले चुनाव में तीनों संसदीय क्षेत्रों में दो पर आम आदमी पार्टी और एक पर अकाली भाजपा गठबंधन ने जीत दर्ज की थी। कांग्रेस यहां किसी भी सीट पर जीत दर्ज नहीं कर पाई थी। हालांकि इससे पहले 2009 में दो सीटों (पटियाला व संगरूर) पर कांग्रेस के सांसद थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में स्वयं कैप्टन अमरिंदर सिंह, अमृतसर संसदीय सीट से केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को एक लाख से ज्यादा मतों से हराने में सफल रहे थे, लेकिन उनकी पत्नी परनीत कौर पटियाला सीट से चुनाव हार गई थीं।
एक ही परिवार के दो सदस्यों को संसदीय चुनाव में उतारे जाने के कारण शाही परिवार दोनों सीटों पर तवज्जो देने के संतुलन को कायम नहीं रख पाया। पटियाला में डॉ. धर्मवीर गांधी की साधारण छवि व आप की लहर का असर शाही परिवार पर भारी पड़ गया। संगरूर सीट से आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी भगवंत मान ने सभी को हैरत में डालते हुए न केवल पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखदेव सिंह ढींढसा को मात दी, बल्कि विकास के नाम पर वोट मांग रहे तब के सांसद विजयइंदर सिंगला की जमानत तक जब्त करा दी थी।
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सांसद के तौर पर विजयइंदर सिंगला ने कई प्रोजेक्ट पारित करवाने में कामयाबी हासिल की थी। हालांकि पूर्व सीएम प्रकाश सिंह बादल की पुत्रवधू व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल, मुश्किल से अपने सीट बचाने में सफल रही थीं। मालवा की सियासी जमीन पर तीनों परिवार फिर से जनता के बीच होंगे।
देश के सबसे अनुभवी सियासतदान माने जाते हैं बादल
पंजाब के पांच बार मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल को सियासत का करीब 70 साल का लंबा अनुभव है। इसी वजह से शायद उन्हें देश का सबसे अनुभवी राजनीतिज्ञ माना जाता है। शालीनता, अनुशासन और नर्म स्वभाव उनकी सबसे बड़ी शक्ति मानी जाती है। गांव की सियासत से शुरू हुआ उनका सफर पंजाब के सीएम की कुर्सी तक पहुंचा। 1947 में बादल ने अपना सियासी जीवन शुरू किया था और 1957 में पहला विधानसभा चुनाव जीता था।
अकाली दल के भीतर उन्हें कई दिग्गज नेताओं से चुनौती मिलती रही लेकिन अपने करीबी साथियों की मदद से न केवल चुनौतियों को दूर करते रहे बल्कि दिग्गज नेताओं को सियासी तौर पर कमजोर करके अपने वर्चस्व को मजबूत बनाते गए। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सरकार में बादल, केंद्रीय मंत्री भी रहे। उनके बेटे सुखबीर सिंह बादल, बहू हरसिमरत कौर बादल के अलावा दामाद आदेश प्रताप सिंह कैरों भी सियासत में सक्रिय हैं।
हरसिमरत कौर के भाई बिक्रम सिंह मजीठिया ही राजनीति में पैठ जमाए हुए हैं। सीनियर बादल के नेतृत्व में अकाली ने भाजपा से गठबंधन करके हिंदू सिख एकता की आवाज बुलंद की।
अपने ढंग से सियासत करते हैं कैप्टन
मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, पटियाला के शाही परिवार से ताल्लुक रखते हैं। भारतीय सेना में कैप्टन रहे अमरिंदर सिंह ने आपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में कांग्रेस को अलविदा कह दिया था। बाद में अलग पार्टी का गठन किया और फिर उस दल को कांग्रेस में समायोजित कर दिया। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के सहपाठी रहे कैप्टन ने 1980 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा था।
कैप्टन अपने ढंग से सियासत करते हैं। जब पूरे देश में मोदी की लहर थी और तकरीबन हर राज्य में भाजपा अपने सहयोगियों के साथ जीत का परचम लहरा रही थी तब कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 2017 में पंजाब में कांग्रेस को बहुमत से सत्ता दिलाकर भाजपा का विजयी रथ रोका था। अपने अंदाज और शैली से पंजाबियों में जोश भरने वाले कैप्टन की पत्नी परनीत कौर, इस बार पटियाला से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही हैं।
इसके अलावा उनके बेटे रणइंद्र सिंह भी दो चुनाव लड़ चुके हैं। पंजाब में विरोधी दलों को कड़ी टक्कर देने में सक्षम कैप्टन ने कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर भी आस की किरण जगाई है।
सुनाम के छोटे से गांव उभावाल से सियासत का आगाज करने वाले राज्यसभा सदस्य सुखदेव सिंह ढींढसा 1972 में पहली बार विधायक बने। चार बार विधायक, तीन बार राज्यसभा सदस्य और एक बार लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए हैं। अकाली दल पर जब भी संकट के बादल मंडराए तो ढींढसा ने प्रकाश सिंह बादल की ढाल बनकर पार्टी को संकट से उबारा।
माना जाता है कि जब सीनियर बादल को अपने समकक्ष नेता से चुनौती मिलती थी तो सीनियर ढींढसा ही अपनी सूझबूझ से उस चुनौती का समाधान करते थे। खुद बादल भी मंच से कई बार ऐसा कह चुके हैं। संगरूर, बरनाला के अलावा पटियाला में भी पार्टी को मजबूत करने में योगदान देने वाले ढींढसा, वाजपेयी सरकार में कैबिनट मंत्री रहे। वाजपेयी सरकार में उनके कार्यशैली को कई बार सराहा गया।
इसके अलावा दिल्ली की राजनीति में उन्होंने अकाली दल का वर्चस्व कायम किया और कई राज्यों में विस्तार की योजना को अमली रूप दिया। फिलहाल उन्होंने अकाली दल के तमाम पदों से त्यागपत्र दे दिया है। उनके बेटे परमिंदर सिंह ढींढसा (पूर्व वित्तमंत्री) लगातार पांच बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं और अब पार्टी उन्हें संगरूर संसदीय सीट से चुनाव मैदान में उतारने की तैयारी में है।