चौटाला परिवार का दामन छोड़कर जाने वाले विधायकों की परंपरा नई नहीं है। विधायक पहले भी कई बार देवीलाल की विरासत इनेलो की सियासी नैया भंवर में फंसा चुके हैं। हरियाणा में पहले ‘इनेलो’ सियासी दल जनता पार्टी व लोकदल हुआ करता था, जिसका झंडा प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी देवी लाल ने उठा रखा था। बाद में देवीलाल के बेटे ओपी चौटाला ने इसे इंडियन नेशनल लोकदल बनाया।
पार्टी का स्वरूप तो इनेलो के रूप में उभर गया, लेकिन चौटाला परिवार से जुड़े विधायकों ने कई बार पार्टी को राजनीतिक संकट में डाला। इमरजेंसी के दौरान 1977 में चौधरी देवी लाल ने जनता पार्टी के बैनर तले सभी विधानसभा सीटों से अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। उस वक्त पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल भी जनता पार्टी का हिस्सा थे। जनता पार्टी के 75 विधायक इस चुनाव में जीते थे।
जबकि राव बीरेंद्र सिंह की विशाल हरियाणा पार्टी (सितंबर 1978 में कांग्रेस में मर्ज हो गई) को 5 और कांग्रेस को सिर्फ 3 सीटें मिली थी। चौधरी देवी लाल को मुख्यमंत्री बनाया गया था, लेकिन 738 दिन बाद सियासी तूफान आया। भजनलाल ने पार्टी विधायकों का समर्थन अपने पक्ष में लेते हुए जून 1979 में गवर्नर के समक्ष मुख्यमंत्री बनने का दावा ठोक दिया।
75 में से आधे से ज्यादा विधायकों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री देवीलाल से समर्थन वापस लेते हुए बगावत कर दी। अंतत: मुख्यमंत्री देवीलाल को अपना इस्तीफा गवर्नर को सौंपना पड़ा।