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लोकसभा चुनाव 2019: ‘अपने’ पहले भी भंवर में फंसा चुके हैं चौटाला परिवार की नैया, जानिए कैसे

Sun, 24 Mar 2019 10:52 AM IST
खुशबू गोयल मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़
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ओम प्रकाश चौटाला - फोटो : फाइल फोटो
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चौटाला परिवार का दामन छोड़कर जाने वाले विधायकों की परंपरा नई नहीं है। विधायक पहले भी कई बार देवीलाल की विरासत इनेलो की सियासी नैया भंवर में फंसा चुके हैं। हरियाणा में पहले ‘इनेलो’ सियासी दल जनता पार्टी व लोकदल हुआ करता था, जिसका झंडा प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी देवी लाल ने उठा रखा था। बाद में देवीलाल के बेटे ओपी चौटाला ने इसे इंडियन नेशनल लोकदल बनाया।
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पार्टी का स्वरूप तो इनेलो के रूप में उभर गया, लेकिन चौटाला परिवार से जुड़े विधायकों ने कई बार पार्टी को राजनीतिक संकट में डाला। इमरजेंसी के दौरान 1977 में चौधरी देवी लाल ने जनता पार्टी के बैनर तले सभी विधानसभा सीटों से अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। उस वक्त पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल भी जनता पार्टी का हिस्सा थे। जनता पार्टी के 75 विधायक इस चुनाव में जीते थे।

जबकि राव बीरेंद्र सिंह की विशाल हरियाणा पार्टी (सितंबर 1978 में कांग्रेस में मर्ज हो गई) को 5 और कांग्रेस को सिर्फ 3 सीटें मिली थी। चौधरी देवी लाल को मुख्यमंत्री बनाया गया था, लेकिन 738 दिन बाद सियासी तूफान आया। भजनलाल ने पार्टी विधायकों का समर्थन अपने पक्ष में लेते हुए जून 1979 में गवर्नर के समक्ष मुख्यमंत्री बनने का दावा ठोक दिया।
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75 में से आधे से ज्यादा विधायकों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री देवीलाल से समर्थन वापस लेते हुए बगावत कर दी। अंतत: मुख्यमंत्री देवीलाल को अपना इस्तीफा गवर्नर को सौंपना पड़ा।
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अभय चौटाला का दावा, पार्टी फिर मजबूती से खड़ी होगी

29 जून 1979 को भजनलाल ने विधायकों का समर्थन अपने पक्ष में दिखाते हुए मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 1980 में मुख्यमंत्री भजन लाल भी जनता पार्टी छोड़कर कांग्रेस का हिस्सा बन गए। 1982 में फिर विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में कांग्रेस ने 36, लोकदल (देवीलाल की नई पार्टी) ने 31, भाजपा ने 6 सीटें जीती। जबकि 16 सीटों पर आजाद प्रत्याशी विजयी हुए।

इस दौरान भी देवीलाल की लोकदल के विधायकों को भी कांग्रेस ने तोड़ लिया। देवीलाल समेत सिर्फ 9 विधायक ही बचे थे। कांग्रेस ने इसका फायदा उठाया और भजनलाल फिर मुख्यमंत्री बने। लेकिन 1987 के विधानसभा चुनाव में देवीलाल की लोकदल ने प्रचंड बहुमत हासिल किया और अपने 60 विधायकों को जितवाया। भाजपा को 16 और कांग्रेस को सिर्फ 5 सीट मिली। देवीलाल मुख्यमंत्री बने।

इसी कार्यकाल में देवीलाल के उपप्रधानमंत्री बनने के बाद उनके पुत्र ओमप्रकाश चौटाला और फिर बनारसी दास गुप्ता और हुकम सिंह को भी मुख्यमंत्री बनाया गया था। मगर 1991 में फिर से भजनलाल मुख्यमंत्री हुए। अब फिर इनेलो के विधायकों ने बगावत का झंडा बुलंद कर रखा है। 5 विधायक और 1 सांसद ने खुद को इनेलो से अलग कर लिया है। इसके चलते नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी को भी खतरा हो गया है।

इनेलो की इस उठापटक पर विधायक व नेता प्रतिपक्ष अभय चौटाला कहते हैं कि इतिहास रहा है जिस भी विधायक ने उनकी पार्टी छोड़ी है, वे दोबारा कभी जीतकर विधानसभा या संसद में नहीं जा सका। उन्होंने कहा कि इनेलो फिर से मजबूती से खड़ी होगी।
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