अकाली दिग्गजों की कमी
अमृतसर के ग्रामीण इलाकों में भाजपा को जिताने की जिम्मेदारी शिअद की होती है। लेकिन इस बार शिअद के कई दिग्गज गायब हैं। मजीठिया का प्रतिनिधित्व करने वाले बिक्रम मजीठिया बठिंडा में हरसिमरत कौर बादल के चुनाव में फंसे हैं। अटारी के प्रतिनिधि गुलजार सिंह रणिके खुद फरीदकोट से चुनाव लड़ रहे हैं। अजनाला के प्रतिनिधि पूर्व सांसद रतन सिंह अजनाला और उनके बेटे बोनी अजनाला ने पार्टी छोड़कर शिरोमणि अकाली दल-टकसाली बना ली है।
प्रचार में मुख्य मुद्दे गायब
चुनाव में मुख्य मुद्दे गायब हैं। कंटीले तार के पार खेती, बॉर्डर एरिया पैकेज, इंडस्ट्री का रिवाइवल, इंटिग्रेटेड चेक पोस्ट से पाकिस्तान को खुला कारोबार और नशे जैसे मुद्दे शहर के लिए अहम हैं। कस्टम ड्यूटी 200 फीसदी होने से कारोबार ठप है। शहर में ट्रैफिक सबसे बड़ी समस्या है, तो बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था भी है। जीएसटी, नोटबंदी और राज्य सरकार द्वारा इंडस्ट्री को सस्ती बिजली के वादे की बात भी कोई नहीं कर रहा है।
कांग्रेस को भी है भितरघात का खतरा
2017 के उपचुनाव में गुरजीत औजला करीब दो लाख वोटों से जीते थे। लेकिन पार्टी के स्थानीय नेताओं में उनका काफी विरोध है। शहर के पांच विधायकों ने पार्टी को लिखकर दिया था कि औजला को टिकट नहीं दिया जाए। क्योंकि सांसद के तौर पर औजला की गतिविधियों ने विधायकों के लिए ही समस्याएं खड़ी कर दीं। शुरुआत में कोई भी नेता उनके साथ नहीं चल रहा था। पर सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने घुड़की दी कि जिस हलके से भी कोई हारा तो मंत्री पद ले लिया जाएगा। इसके बाद से विधायक चल तो रहे हैं पर हर किसी को लगता है कि दिल से काम नहीं कर रहे। ऐसी आशंका है कि ऐन मौके पर कहीं से भितरघात भी हो सकती है। लोग कहते हैं कि कांग्रेस ने आने के बाद कुछ खास नहीं किया, लेकिन उतनी एंटी इनकम्बेंसी नहीं है। दूसरी राहत यह है कि नौ विधानसभा हलकों में से आठ कांग्रेस के पास हैं। यहां तीन मंत्री और चेयरमैन हैं।
भाजपा का इमोशनल कार्ड
कांग्रेस स्थानीय और मिलनसार औजला बनाम बाहरी पुरी का मुद्दा बना रही है। इसके जवाब में भाजपा ने इमोशनल कार्ड खेला है। भाजपा के चुनाव प्रचार में लोगों से यही कहा जा रहा है कि पिछली बार गलती कर ली, इस बार मत करना। जेटली का मंत्री बनना तय था, फिर भी हरा दिया। पुरी तो पहले से मंत्री हैं, राजग आई तो उनका दोबारा मंत्री बनना तय है। ऐसे में पुरी की जीत ही शहर के लिए बेहतर होगी। अगर इस बार भी हैवीवेट कैंडिडेट हारा तो आगे से किसी ने अमृतसर वालों की सुध नहीं लेनी। भाजपा को लगता है कि 1984 के सिख नरसंहार पर सैम पित्रोदा के बयान से सिख वोटों का ध्रुवीकरण उसके पक्ष में होगा। तो कांग्रेस को लगता है कि बेअदबी और नशों को लेकर शिअद के प्रति लोगों के गुस्से का उसे फायदा होगा।