26 साल पुराने हरपाल सिंह (15) के फर्जी एनकाउंट के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने बुधवार को दो पुलिस वालों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत में पुलिस की सारी कहानी फर्जी साबित हुई। दोषियों में तत्कालीन ब्यास थाने के एसएचओ रघबीर सिंह और एएसआई दारा सिंह शामिल हैं। दोनों को धारा 302 में उम्रकैद व धारा-364 क तहत 10 साल की सजा सुनाई है।
मामले के एक मुख्य आरोपी राम लुबाया की ट्रायल के दौरान मौत हो गई थी, जबकि तीन पुलिस मुलाजिमों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। इनमें पुलिस कर्मी परमजीत सिंह, निर्मल सिंह व जसबीर सिंह शामिल हैं। यह फैसला जज एनएस गिल की अदालत ने सुनाया। फैसले के बाद पुलिस दोनों को पटियाला जेल ले गई।
घर से उठाकर ले गई पुलिस, फिर मारा
यह बात 14 सितंबर, 1992 की है। सुबह करीब पांच-छह बजे गांव पल्ला, थाना ब्यास (अमृतसर) की पुलिस हरपाल सिंह के घर पहुंची। एसआई राम लुबाया की अगुवाई वाली टीम पंद्रह वर्षीय हरपाल को घर से उठाकर ब्यास थाने ले गई। चार दिन तक उन्होंने अवैध तरीके से हरपाल को हिरासत में रखा। इसी बीच पुलिस ने दावा किया 17 नवंबर, 1992 की रात को पुलिस ने उसे एनकाउंटर में भागते हुए मारा था।
पुलिस का दावा था बीस मिनट तक चली थी फायरिंग
जब पुलिस ने यह फर्जी एनकाउंटर किया था, तब दावा किया था कि पुलिस व सीआरपीएफ की टीम ज्वाइंट रूप से गांव निज्जर में पेट्रोलिंग कर रही थी। तभी दो लड़कों ने पुलिस पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी थी। पुलिस का दावा था कि उस समय बीस मिनट तक फायरिंग हुई थी। उसमें 217 गोलियां चली थीं। उसके बाद जब पुलिस ने सर्च ऑपरेशन चलाया तो एक युवक का शव मिला था। उसकी पहचान हरपाल सिंह के रूप में हुई थी।
पुलिस की गाड़ियों व रिकॉर्ड से पकड़ा गया झूठ
हालांकि बाद में यह पुलिस की कहानी पूरी तरह से झूठी पड़ गई। पुलिस के मालखाने में 217 गोलियां चलने संबंधी कोई रिकॉर्ड नहीं मिला था। पुलिस के वाहनों पर किसी तरह की गोलियां चलने आदि के निशान नहीं थे। किसी भी पुलिस वाले को इस दौरान कोई खरोंच तक नहीं आई थी।
बाद में हरपाल के साथी को भी मार डाला था
पुलिस ने अपनी फर्जी कहानी में दावा किया था कि हरपाल सिंह इस दौरान मारा गया था। जबकि उसका दूसरा साथी हरजीत मौके से फरार हो गया था। बाद में उसे पकड़ लिया गया था और उसने अपना अपराध कबूल कर लिया। बाद में 15-16 दिन में भी वह मारा गया था।
शव तक नहीं दिया गया था परिजनों को
हत्या के बाद हरपाल सिंह का शव भी परिजनों को नहीं सौंपा गया था। परिजनों ने थाने में मारे गए लोगों के रजिस्ट्रर में लगी फोटो देखकर अपने बच्चे की पहचान की थी। इस दौरान उन्हें बताया गया था कि वह एनकाउंट में मारा गया है।
यहां भी पकड़ा गया पुलिस का झूठ
हालांकि पुलिस का दावा था कि उस समय बीस मिनट में 217 गोलियां चली थीं। हालांकि जो हरपाल की पोस्टमार्टम आई थी उसमें बताया गया था कि तीन मीटर की दूरी से गोलियां चली थीं। एक गोली हरपाल के माथे और एक आंखें के नीचे लगी थी। इससे ही उसकी मौत हुई थी। फिर 217 गोलियां पुलिस वालों ने किस पर बरसाईं थीं।