हरियाणा में हुड्डा शासनकाल में जमीन के सीएलयू के लिए रिश्वत की शिकायत पर लोकायुक्त की ओर से पांच पूर्व विधायकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का रास्ता साफ हो गया है।
एकल बेंच ने लोकायुक्त के फैसले पर रोक लगा दी थी। हरियाणा सरकार ने इसे अपील में चुनौती दे दी। अब डिवीजन बेंच ने अपील पर सुनवाई करते हुए एकल बेंच के फैसले पर रोक लगा दी है।
सरकार ने अपील में कहा है कि एफआईआर दर्ज करने का मुकम्मल आधार है। सरकार की इस दलील के बाद जस्टिस हेमंत गुप्ता की डिवीजन बेंच ने एकल बेंच के फैसले पर रोक लगा दी है। अब सरकार के पास एफआईआर दर्ज करने के अधिकार आ गए हैं और सीएलयू कांड में फंसे पांच पूर्व विधायकों विनोद भ्याणा, राव नरेंद्र सिंह, नरेश सेलवाल, जरनैल सिंह व राम निवास घोडे़ल्ला के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि सरकार को मिली यह छूट डिवीजन बेंच के फैसले पर आधारित रहेगी।
छठे पूर्व विधायक राम किशन फौजी ने भी लोकायुक्त के फैसले को चुनौती दी है। उनके खिलाफ भी एफआईआर दर्ज करने का आदेश लोकायुक्त ने दिया था।
फौजी ने अलग से अपील दायर की है। डिवीजन बेंच ने फौजी की अपील की सुनवाई भी पांच विधायकों के खिलाफ सरकार की अपील के साथ करने का फैसला लिया है। सुनवाई एक फरवरी को होनी है।
लोकायुक्त के फैसले के खिलाफ अपील की पैरवी करते हुए पूर्व विधायकों विनोद भ्याणा, राव नरेंद्र सिंह, नरेश सेलवाल, जरनैल सिंह व राम निवास घोडे़ल्ला की ओर से एडवोकेट राजीव आत्मा राम ने बेंच का ध्यान आकर्षित किया था कि नियमानुसार एफआईआर के लिए प्राथमिक सुबूत पुख्ता होता है। सेकेंडरी सुबूत पर एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। बेंच को अवगत कराया गया कि इन पांच पूर्व विधायकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए सेकेंडरी सुबूत ही हैं। जिस सीडी को सुबूत मान कर एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया, वह सेकेंडरी है।
कहा था कि इस मामले में प्राथमिक सबूतों यानी वह कैमरा और एचडी कार्ड, जिसे आरोपों की रिकार्डिंग के लिए इस्तेमाल होने की बात कही जा रही है, उन्हें हैदराबाद की फॉरेंसिक लैब ने खाली करार दे रखा है। सीडी मुख्य सुबूतों से ही बन सकती है, लेकिन जब प्राथमिक सुबूत ही नहीं तो सेकेंडरी सुबूत सीडी के आधार पर एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। एडवोकेट ने यह भी कहा कि सीडी बनाने के लिए पहले एचडी कार्ड कंप्यूटर में डाला जाता है और सीडी बनने के बाद यदि कंप्यूटर में डाटा डिलीट भी हो जाए तो कंप्यूटर में ऐसा डाटा दोबारा ढूंढा जा सकता है।
एडवोकेट ने बेंच को बताया था कि इन विधायकों के संबंध में कंप्यूटर का डाटा दोबारा ढूंढा ही नहीं जा सका। ऐसा हैदराबाद लैब अपनी रिपोर्ट में बता चुकी है।
इसके अलावा यह दलील भी दी गई कि जिन जमीनों केसीएलयू के लिए रिश्वत का आरोप लगाया गया है, उन जमीनों की सीएलयू के लिए कोई आवेदन सरकार के पास आया ही नहीं था। इन दलीलों के साथ पैरवी की गई कि लोकायुक्त ने फैसला देते वक्त ऐसे तथ्यों पर गौर नहीं किया, लिहाजा एफआईआर दर्ज करने का आदेश रद्द किया जाना चाहिए और मामले की सुनवाई तक लोकायुक्त के फैसले पर रोक लगाई जानी चाहिए।
बेंच ने सरकारी वकील से पूछा कि लोकायुक्त केनिर्देश के बाद क्या कार्रवाई की गई। इस पर सरकारी वकील ने बताया कि अभी एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। इसके बाद एकल बेंच ने एफआईआर दर्ज करने पर अगले निर्देश तक रोक लगाते हुए सुनवाई स्थगित कर दी थी। अब एकल बेंच के फैसले को सरकार ने चुनौती दे दी है।