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पंजाब में बंजर हो रही जमीन: 119 में से केवल 19 ब्लॉकों में बचा भू-जल, माहिर बोले-फसल विविधीकरण ही बेहतर विकल्प

Tue, 12 Nov 2024 03:32 PM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

डॉ. विनोद कुमार चौधरी ने बताया कि पराली की समस्या से निपटने के लिए बेहद जरूरी है कि किसानों को केवल धान और गेहूं की ही फसल की पैदावार करने से रोका जाए। किसानों को एक चक्र क्रिया के जरिये तिलहन-दलहन की खेती भी करनी चाहिए, जिससे खेत की जमीन के जरूरी खनिज पदार्थ बने रहें।
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पंजाब में गिरता भूजल - फोटो : संवाद
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विस्तार
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पंजाब की 33 प्रतिशत जमीन बंजर हो चुकी है। 119 में से केवल 19 ब्लॉकों में भू-जल रह गया है। 100 से अधिक ब्लॉकों में भूजल स्तर खतरे के निशान पर है। प्रदेश में 86 प्रतिशत किसान ऐसा हैं, जिसके पास खेतीबाड़ी के लिए केवल दो हेक्टेयर तक ही जमीन उपलब्ध है। ये बातें पंजाब विश्वविद्यालय समाजशास्त्र विभाग के एचओडी डॉ. विनोद कुमार चौधरी ने कहीं।
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अमर उजाला से विशेष बातचीत में डॉ. विनोद कुमार चौधरी ने बताया कि पराली की समस्या से निपटने के लिए बेहद जरूरी है कि किसानों को केवल धान और गेहूं की ही फसल की पैदावार करने से रोका जाए। किसानों को एक चक्र क्रिया के जरिये तिलहन-दलहन की खेती भी करनी चाहिए, जिससे खेत की जमीन के जरूरी खनिज पदार्थ बने रहें। लंबे समय तक एक प्रकार की खेती करने से खेत की मिट्टी के जरूरी तत्व, खनिज और अन्य पदार्थ समय के साथ खत्म हो जाते हैं, जोकि फिर लंबे समय के बाद बंजर जमीन में तबदील हो जाती है। अलग-अलग फसलों की पैदावार से जमीन के खनिज बने रहते हैं और उन्हें पनपने के लिए भरपूर समय मिल जाता है। यही कारण है कि हमारे बुजुर्ग ज्यादातर अलग-अलग प्रकार की खेती करते थे।

किसानों को नहीं मिलता कार्बन क्रेडिट

डॉ. चौधरी ने कहा कि किसानों के लिए बने कार्बन क्रेडिट का लाभ आज एग्रो इंडस्ट्री उठा रही है, जबकि इसका लाभ किसानों को मिलना चाहिए। किसानों को फसल विविधीकरण के अलावा प्राकृतिक व जैविक खेती की ओर बढ़ावा देने के साथ ही कार्बन क्रेडिट दिया जाना चाहिए। कार्बन क्रेडिट एक प्रकार का केंद्र सरकार की ओर से राज्य को दिया जाने वाला ऐसा फंड होता है, जिसका प्रयोग किसान अपनी अन्य खेतीबाड़ी के लिए कर सकते हैं, बशर्ते वे कार्बन उत्सर्जन को बढ़ावा न देते और इसे कम करने के दिशा में ही खेतीबाड़ी करते हों।

पीयू के कैंपस में रोज आती है 15 से 16 हजार गाड़ियां

प्रोफेसर चौधरी ने बताया कि अक्तूबर और नवंबर में अकेले किसानों के पराली जलाने से प्रदूषण स्तर खराब नहीं होता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि पंजाब विश्वविद्यालय में रोज औसतन 15 से 16 हजार वाहन एंट्री करते हैं। मान कर चलें कि एक वाहन एक दिन में पांच लीटर पेट्रोल या डीजल की खपत करता है तो ये वाहन सालाना 2.73 करोड़ लीटर ईंधन जलाते हैं। वाहनों के इन ईंधन के इस्तेमाल से निकलने वाले कार्बन व अन्य गैस भी प्रदूषण को बड़े स्तर पर नुकसान पहुंचा रहे हैं। इसके अलावा उद्योगों से होने वाला प्रदूषण सबसे ज्यादा खतरनाक है, इसलिए केवल पराली जलाने को ही इसका जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
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