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Chandigarh: बंटवारे में पाकिस्तान से आए कोहली परिवार ने बनाया था 'अरोमा', कई यादगार लम्हों का गवाह है होटल

Mon, 15 May 2023 03:57 PM IST
निवेदिता वर्मा रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

मनमोहन कोहली ने बताया कि बंटवारे के बाद उनका परिवार चंडीगढ़ आ गया था। उस समय चारों तरफ खेत और जंगल थे। धीरे-धीरे बसावट हो रही थी। उस दौरान पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों ने मेरे पिता व चाचा को (कोहली ब्रदर्स) से कहा कि चंडीगढ़ में होटल बनाओ।
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मनमोहन सिंह - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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नए साल का मौका हो या क्रिकेट के किसी मैच में भारत की रोमांचक जीत। चंडीगढ़ में जश्न तो अरोमा लाइट प्वाइंट पर ही मनता है। अरोमा लाइट प्वाइंट चंडीगढ़ की पहचान है। इसका नाम अरोमा होटल की वजह से पड़ा है, जो सेक्टर 21-22 चौक पर ही स्थित है। सिटी ब्यूटीफुल के इस सबसे पुराने होटल का निर्माण होटलिस्ट मनमोहन कोहली व उनके परिवार ने किया था।

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यह होटल जेपी आंदोलन से लेकर क्रिकेट वर्ल्ड कप की जीत के जश्न का गवाह है। किसी जमाने में यह होटल बंद होने के कगार पर पहुंच गया था, लेकिन कोहली ने अपनी मेहनत व विनम्र स्वभाव के बल से न सिर्फ अरोमा होटल को दोबारा खड़ा किया बल्कि इसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ने दी। वह कहते हैं कि अगर सफलता के संग विनम्रता है तो वह मील का पत्थर है, वरना सिर्फ पत्थर के समान है।

खुद पर था विश्वास, कभी पीछे नहीं हटे
मनमोहन कोहली ने बताया कि बंटवारे के बाद उनका परिवार चंडीगढ़ आ गया था। उस समय चारों तरफ खेत और जंगल थे। धीरे-धीरे बसावट हो रही थी। उस दौरान पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों ने मेरे पिता व चाचा को (कोहली ब्रदर्स) से कहा कि चंडीगढ़ में होटल बनाओ। कोहली भाई लाहौर के दिनों से कैरों को जानते थे और उनके विजन पर उनका विश्वास था। 1953 में होटल शुरू हुआ। होटल का नाम अरोमा नाम रखा गया। यह नाम मेरे चाचा ने रखा था।
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उनका कहना था कि होटल का नाम ऐसा हो, जिसे सुनते ही लोगों को खाने की खुशबू आने लगे, लेकिन होटल के निर्माण के कुछ साल बाद ही अरोमा बंद होने की कगार पर पहुंच गया। कमाई नहीं हो रही थी। ऐसा लगा कि सपने बिखर जाएंगे लेकिन परिवार ने हिम्मत बंधाई। खुद पर विश्वास था। पीछे नहीं हटे। विचार करने के बाद सरकार को इसकी जानकारी दी। उस दौरान सिर्फ एक ही होटल था। सरकार भी नहीं चाहती थी कि यह होटल बंद हो। सरकार ने दरियादिली दिखाई और इसे पीडब्ल्यूडी का रेस्ट हाउस बना दिया गया। यहां पर अधिकारी ठहरते थे। उस जमाने में एक कमरे का एक रुपये किराया रोज मिलता था। एक रुपया भी उस समय भी बहुत होता था ।

एक लाख के चेक पर किया साइन, तो लगा कुछ कर लिया
मनमोहन कोहली ने बताया कि 1970 से लेकर 1984 तक का दौर उनके लिए बहुत कठिन रहा। परिवार पर काफी कर्ज था, जिसे पिछले काफी समय से उतारने की कोशिश कर रहे थे। धीरे-धीरे होटल चलने लगा। 1986-87 में जब पहली बार खुद के कमाए पैसों से एक लाख रुपये का चेक काटा तो लगा कि जीवन में कुछ पा लिया है, क्योंकि उस समय एक लाख रुपये बहुत बड़ी राशि थी। बैंकों ने काफी भरोसा किया। 

मनमोहन सिंह की पत्नी डॉ रीतिंदर मोहन शिक्षाविद हैं और वह गवर्नमेंट कॉलेज रोपड़ से बतौर प्रिंसिपल सेवानिवृत्त हुई हैं। एक बेटा और बेटी हैं। दोनों बिजनेस पर्सन हैं। उन्होंने बताया कि होटल के साथ रियल एस्टेट और फाइनेंस का भी बिजनेस है। उत्तर प्रदेश में भी उनके पिता ने सिनेमा हॉल बनाए थे, लेकिन बाद में वह पंजाब वापस आ गए। आज जहां पर नीलम थियेटर है, वह जमीन भी उनकी ही थी लेकिन सरकार के आग्रह पर दे दिया गया था।

अब वीकेंड में कमरे नहीं मिलते
मनमोहन कोहली कहते हैं कि पहले घूमना, सैर-सपाटा संनन्न लोगों का शगल माना जाता था लेकिन आज की युवा पीढ़ी इसे जरूरत के तौर पर देख रही है। पहले पहाड़ों में घूमने सिर्फ अमीर लोग जाते थे। पर्यटन की तरफ जो मानसिकता थी, उसमें बहुत बड़ा बदलाव आया है। इससे होटल उद्योग में नया उछाल आया है। पहले होता था कि वीकेंड के दिनों में कमरे खाली हो जाते थे और वर्किंग दिनों में कमरे बुक रहते थे लेकिन अब उल्टा हो गया है। वीकेंड के दिनों में होटलों में कमरे नहीं मिलते हैं।

फैसले लेने के लिए केंद्र की तरफ देखना न पड़े
चंडीगढ़ तब तक रफ्तार से आगे नहीं बढ़ पाएगा, जब तक चंडीगढ़ अपने फैसले खुद न ले। मेरा मानना है कि चंडीगढ़ की अपनी खुद की विधानसभा होनी चाहिए, ताकि चंडीगढ़ के फैसले चंडीगढ़ में लिए जा सके। हर छोटे फैसले के लिए केंद्र सरकार की तरफ हमें न देखना पड़े। शहर को चलाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और दूरदर्शी सोच की जरूरत है।

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