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आयुष्मान भारत का बना कार्ड लेकिन इलाज को तरस रहे लोग, नहीं मिल रहा फायदा

Mon, 30 Sep 2019 03:18 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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31 वर्षीय राजेश की दोनों किडनी डैमेज हैं। वे डायलिसिस पर हैं। उनका इलाज पीजीआई में चल रहा है। हफ्ते में कभी एक तो कभी दो बार डायलिसिस होता है। एक डायलिसिस में कम से कम दो हजार रुपये का खर्च आता है। उनके इलाज का एक मात्र रास्ता यही है कि उनकी किडनी का ट्रांसप्लांट हो जाए, लेकिन उनके पास इतनी भी राशि नहीं है कि वे डायलिसिस करा पाएं। 

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आयुष्मान भारत उनकी उम्मीद जगाता है। वे आयुष्मान की लाभार्थी की सूची में शामिल हैं। उनके पास कार्ड भी है। जब उन्होंने पीजीआई में अपना कार्ड दिखाया तो उन्हें इलाज के लिए मना कर दिया गया। दरअसल, किडनी ट्रांसप्लांट आयुष्मान के पैकेज में शामिल नहीं है। आयुष्मान से जो उम्मीद बंधी थी, वह एक झटके में बिखर गई।

इसी तरह पंजाब के गुरविंदर सिंह का केस है। वे मल्टीपल मायोलामा से पीड़ित हैं। इस बीमारी का एकमात्र इलाज बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) है। बोन मैरो में कम से कम पांच लाख रुपये का खर्च आएगा। गुरविंदर सिंह की इतनी हैसियत नहीं है कि वे अपना इलाज करवा पाएं। उनका आयुष्मान भारत का कार्ड बना हुआ है, लेकिन बोन मैरो भी आयुष्मान के दायरे में नहीं आता। वे भी अब इलाज के लिए असमर्थ हैं। 
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वे अब सीएम व सांसद के चक्कर काट रहे हैं, ताकि उन्हें इलाज मिल पाए। इसमें कोई शक नहीं कि आयुष्मान योजना गरीबों के इलाज के लिए एक बेहतरीन योजना है। इसमें हर लाभार्थी को प्रत्येक साल पांच लाख रुपये का हेल्थ बीमा मिलता। इसका मतलब है कि यदि कोई लाभार्थी बीमार पड़ता है तो पांच लाख रुपये तक इलाज मुफ्त में दिया जाएगा। 

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इसमें इलाज के करीब 1300 से ज्यादा पैकेज शामिल हैं। हालांकि आयुष्मान में कैंसर की सर्जरी, कीमोथैरेपी, बायपास सर्जरी, न्यूरोसर्जरी, दांतों की सर्जरी, आंखों की सर्जरी और एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी जांच भी शामिल है, लेकिन इसमें ट्रांसप्लांट को शामिल नहीं किया गया है। इसी तरह लिवर ट्रांसप्लांट भी आयुष्मान के दायरे में शामिल नहीं है। पीजीआई की ओर से बताया गया है कि इसमें न तो किडनी ट्रांसप्लांट के मरीजों को लाभ दिया और न ही बोन मैरो ट्रांसप्लांट वाले मरीजों को।

क्या कहते हैं लाभार्थी
किडनी की बीमारी से पीड़ित राजेश ने बताया कि उसके तीन बच्चे हैं। वह लाभार्थी भी और गरीब भी, लेकिन उसे इस योजना का कोई लाभ नहीं मिल रहा। कम से कम पांच लाख रुपये तक के ट्रांसप्लांट का प्रावधान इसमें रखना चाहिए था। यह सच है कि किडनी ट्रांसप्लांट के कई पेशेंट हैं और वे लाभार्थी भी हैं, लेकिन इस योजना के तहत वे लाभ नहीं ले सकते। 

आयुष्मान योजना के असल लाभार्थी यही लोग हैं। चंद्रशेखर की हालत यह है कि उसके डायलिसिस का भी रुपया नहीं है। उसके मुताबिक यदि उसे डायलिसिस की ही सुविधा मिल जाए तो उसकी जिंदगी बच जाएगी। किडनी ऐसी बीमारी है, जिसके इलाज में व्यक्ति का सब कुछ बिक जाता है। लाखों का कर्ज हो जाता है। इस स्थिति में यदि योजना का लाभ मिलता तो मरीजों को जरूर फायदा मिलता।

आयुष्मान भारत में ट्रांसप्लांट को भी दायरे में रखना चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो मरीजों केलिए बड़ी राहत होगी। मैं इस बारे में जल्द प्रधानमंत्री को पत्र लिखूंगा, ताकि लोगों को इसका फायदा मिल सके। -प्रिंस भंढुला, संयोजक मेडिकल सेल बीजेपी
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