आर्मी से सेवानिवृत्त होकर बैंक में सेवा के दौरान मारे गए व्यक्ति की विधवा को आठ साल की कानूनी लड़ाई के बाद पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से इंसाफ मिला है। हाईकोर्ट ने बैंक को आदेश दिया है कि याची को अनुकंपा के आधार पर नौकरी पर तीन माह के भीतर निर्णय लिया जाए। अपने आदेश में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय न केवल होना चाहिए बल्कि होते हुए दिखाई भी देना चाहिए।
याचिका दाखिल करते हुए हिसार निवासी रेखा शर्मा ने हाईकोर्ट को बताया कि उसके पति भारतीय सेना से सेवानिवृत्त होकर पीएनबी (पंजाब नेशनल बैंक) में काम कर रहे थे। 25 दिसंबर 2015 को उनकी मौत हो गई थी और उस समय वह 49 वर्ष के थे।
याची ने 26 अक्तूबर 2016 को अनुकंपा आधार पर नौकरी के लिए बैंक में आवेदन किया लेकिन यह रद्द कर दिया गया। बैंक ने कहा कि याची को पति की मौत के लिए एलआईसी से 45 लाख रुपये मिले हैं और आर्मी से साढ़े 17 हजार रुपये फेमिली पेंशन मिल रही है। ऐसे में परिवार को जरूरतमंद परिवार नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट में याचिका 2017 में दाखिल की गई थी और ऐसे में हाईकोर्ट ने अब इस पर फैसला सुनाते हुए कहा कि अदालत की देरी का परिणाम किसी और को भुगतने नहीं दिया जा सकता। अनुकंपा नियुक्ति और अनुग्रह भुगतान योजनाएं लाभकारी कानून का हिस्सा हैं और इन पर फैसला लेते हुए संविधान के लक्ष्य को ध्यान में रखना चाहिए।
मृतक कर्मचारी की मौत के किसी अन्य पक्ष से मिले मुआवजे को अनुकंपा आधार पर नौकरी के लिए ध्यान में नहीं रखा जाना चाहिए। ऐसे में हाईकोर्ट ने बैंक को आदेश दिया है कि याची के अनुकंपा आधार पर नौकरी के आवेदन पर तीन माह के भीतर निर्णय लिया जाए। कोर्ट ने कहा कि न्याय न केवल होना चाहिए बल्कि होता हुआ दिखना भी देना चाहिए।