जेपी कंपनी को गारबेज प्लांट पर स्टे देने का मामला अब हाईकोर्ट में पहुंच गया है। मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान नगर निगम ने दलील दी कि जेपी कंपनी अनुबंध के अनुरूप काम नहीं कर रही थी। इसलिए एनजीटी के निर्देशानुसार प्लांट को कब्जे में लिया गया। कब्जा लेने के बाद कंपनी को स्टे देना ठीक नहीं है। क्योंकि भविष्य में लगने वाला जुर्माना निगम को भरना है न कि कंपनी को।
निगम ने अपनी याचिका में हाईकोर्ट को बताया कि एनजीटी ने निर्देश दिया था कि जेपी प्लांट कचरे का निस्तारण कर सकता है तो ठीक, नहीं तो निगम इस मामले में निर्णय ले। कचरा प्रोसेस नहीं हुआ तो निगम को ही जुर्माना भरना पड़ेगा। उसके बाद फरवरी माह की सदन की बैठक में तय हुआ था कि जेपी प्लांट को निगम टेकओवर करेगा। प्लांट के अधिकारियों को सात दिन में जगह खाली करने का नोटिस दिया गया था, लेकिन प्लांट के अधिकारी सदन के फैसले के खिलाफ जिला अदालत चले गए।
जिला अदालत ने कहा कि 90 दिनों में प्लांट के अधिकारी कहीं से स्टे ऑर्डर ले आएं या इस फैसले को बदलवा लें। समय सीमा पूरी होने के बाद जब कंपनी के अधिकारी कोई निर्णय नहीं ले सके तो प्लांट को 24 घंटे में खाली करने का नोटिस भेज दिया गया। जेपी प्लांट के अधिकारी निगम से कचरा प्रोसेस करने के एवज में टिपिंग फीस मांग रहे थे, जबकि निगम फीस नहीं देना चाहता था। मामला फिर एनजीटी में पहुंचा। वहां एनजीटी ने कहा कि टिपिंग फीस केवल 9 माह के लिए थी।
अब निगम कंपनी को टिपिंग फीस नहीं देगा। नगर निगम द्वारा कब्जा लेने के बाद जब प्लांट के अधिकारी रोक के आदेश लेकर पहुंचे तो निगम ने साफ कहा कि कब्जा लेने के बाद अब इसका क्या औचित्य है। अब स्टे ऑर्डर के खिलाफ निगम ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए इसे चुनौती दी है।