सिमरन का बचपन से ही अध्यात्म की तरफ ज्यादा रूझान रहा। तीन दशक पहले बुआ ने जब वैराग्य धारण किया, तो तभी से ही सिमरन ने साध्वी बनने का संकल्प लिया था। जिसके बाद से पिता ने सिमरने के इस विचार को बदलने के लिए पुणे के एक नामी कॉलेज में कंप्यूटर साइंस में दाखिला करवाया। चार साल बाद 2018 में पासआउट हुई। लेकिन फिर भी सिमरन ने वैराग्य को अपना लिया।
मां-बाप को है सिमरन पर गर्व
सिमरन की मां सुमिता शर्मा व पिता अशोक को अपनी बेटी पर गर्व है। दीक्षा समारोह में शामिल हुए पिता ने कहा कि उनकी तरफ से बेटियों को अपनी इच्छा के अनुरूप जीवन जीने की पूरी अनुमति है। परिजनों का कहना है कि उन्होंने सोचा था कि वें बिटियां को पढ़ा-लिखा कर किसी सरकारी पद पर देखना चाहते थे।
साथ ही धूमधाम से बिटियां की शादी करना चाहते थे। लेकिन सिमरन की इच्छा दीक्षा लेने की ही थी, बुआ से कहती थी कि मुझे शादी नहीं करनी है। मां का कहना है कि वर्तमान में बेटा-बेटी के बीच कोई अंतर नहीं है। मां होने के नाते मुझे अपनी बेटी सिमरन पर नाज है। अब साध्वी बनकर परमात्मा की शरण में उनकी सेवा करेगी।