चंडीगढ़। पीयू की माटी मेरी मां है, मुझे फनकार बनाने वाली यही माटी है। यह कहते हुए मशहूर गायक, गीतकार और अभिनेता डॉ. सतिंदर सरताज भावुक हो उठे। पंजाब यूनिवर्सिटी में आयोजित विशेष संवाद कार्यक्रम में उन्होंने अपने संघर्ष, संगीत और पीयू से जुड़े सुनहरे दिनों को विद्यार्थियों के साथ साझा किया। उनके साथ प्रसिद्ध गीतकार डॉ. इरशाद कामिल भी मौजूद रहे। दोनों ने युवाओं को रचनात्मकता, ईमानदारी और अपने सपनों पर भरोसा रखने का संदेश दिया।
सरताज ने कहा कि उनके परिवार की पृष्ठभूमि धार्मिक थी और घर में कोई गायक नहीं था। मैं पीयू आकर ही गायक बना। दोस्तों की छोटी-छोटी पार्टियों में गाता था। वहीं, पहली बार श्रोताओं का सामना करना सीखा। उन्होंने कहा कि उनके नाम के आगे डॉक्टर हमेशा से जुड़ा रहे, इसलिए उन्होंने संगीत की पढ़ाई कभी नहीं छोड़ी।
उन्होंने कहा कि वह हमेशा अपने दिल की सुनते हैं। ‘जो मेरा दिल करता है, मैं 99 प्रतिशत वही करता हूं। अगर आप खुद के मुख्तार हैं, तभी सही मायनों में कामयाब हो सकते हैं।’ उन्होंने बताया कि गीत लिखते समय वह कभी यह नहीं सोचते कि वह व्यावसायिक रूप से सफल होगा या नहीं। ‘जो मन में आता है, वही लिखता हूं। कोई सुने या न सुने... यार तो राजी ही है।’
हर व्यक्ति खुद को महसूस कर सके, ऐसे गीत लिखने की कोशिश
सरताज ने कहा कि उनकी कोशिश हमेशा ऐसा गीत लिखने की रहती है, जिसमें हर व्यक्ति खुद को महसूस कर सके। उन्होंने बताया कि वह खुद को हमेशा कोरा बनाए रखना चाहते हैं। यही वजह है कि वह बहुत कम सुनते और पढ़ते हैं। उनकी गाड़ी में भी आमतौर पर संगीत नहीं बजता। शास्त्रीय संगीत से जो सीखा, उसे उन्होंने अपने सहज अंदाज में आत्मसात किया। ‘मैं कभी यह सोचकर नहीं लिखता कि फोक गीत बनाना है, लेकिन मेरी रचनाएं लोगों को अपनी लगती हैं।’
डॉ. इरशाद कामिल बोले-पीयू ने मुझे सादगी की असली खूबसूरती सिखाई
संवाद के दौरान डॉ. इरशाद कामिल ने भी अपने शुरुआती दिनों की यादें साझा कीं। उन्होंने कहा कि बचपन में ऑल इंडिया रेडियो पर पुराने गीत सुनते-सुनते संगीत के प्रति लगाव पैदा हुआ। ‘आज भी मैं उस लड़के को ढूंढ़ता हूं, जो बस स्टैंड से उतरकर सात नंबर बस पकड़कर पंजाब यूनिवर्सिटी आया था। मलेरकोटला की गलियों में मैं बेफिक्र घूमता था, लेकिन पीयू ने मुझे सादगी की असली खूबसूरती सिखाई।’
उन्होंने बताया कि फिल्म लव आज कल पर काम करते समय उन्हें लगा कि फिल्म में प्यार को पूरी तरह अभिव्यक्त करने वाला गीत नहीं है। इसी सोच से आज दिन चढ़ेया तेरे रंग वरगा जैसे लोकप्रिय गीत का जन्म हुआ।
किसी गीत को तोड़ने से पहले उसे समझना जरूरी
जब उनसे पूछा गया कि लोग उनके गीतों के शब्द बदलकर गाते हैं तो कैसा लगता है, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि किसी गीत को तोड़ने से पहले उसे समझना जरूरी है। उन्होंने ए क्या बोलती तू, आती क्या खंडाला गीत का उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार लोग सुनते कुछ हैं और समझते कुछ और हैं। जब कोई गीत लोगों तक पहुंच जाता है, तो वह सिर्फ लेखक का नहीं रहता, जनता का हो जाता है। लोग उसे अपने अंदाज में गाते हैं, यही किसी रचनाकार की सबसे बड़ी सफलता है। कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने दोनों रचनाकारों से सवाल भी पूछे और उनके अनुभवों से प्रेरणा ली। पूरे संवाद में साहित्य, संगीत और जीवन के अनुभवों का ऐसा संगम देखने को मिला, जिसने युवाओं को अपने सपनों पर विश्वास रखने और अपनी मौलिक पहचान बनाने का संदेश दिया।