मैं नारी हूं.... न कभी हारी थी, न कभी हारी हूं। जिंदगी हर कदम इक नई जंग है, हौंसला इतना है कि जीत लूंगी दुनिया मैं अपने दम पर। हिमांशु वासुदेव की एक बेहद खूबसूरत पंक्ति है, हीरे की शफक रखते हो तो अंधेरों में चमको, रोशनी में आकर तो कांच भी चमका करते हैं।
ऐसी ही कुछ महिलाओं से हम आपको मिलवाने जा रहे हैं जिन्होंने समाज की परवाह न करते हुए एक अलग मुकाम हासिल किया कि आज उन पर पूरा समाज फख्र कर रहा है। एक कहावत है जब आप कुछ नया शुरू करते हैं तो लोग आप पर हंसते हैं, ताकि आप घबराकर और हारकर बैठ जाएं।
जो इसकी परवाह नहीं करते उन पर उंगलियां उठाई जाती हैं इसकी भी परवाह न करने वाले ही मंजिल तक पहुंच पाते हैं। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम हार मान लेते हैं या फिर मुश्किलों का डटकर मुकाबला करते हैं। मुकाबला करने वाले ही फिर भीड़ से अलग नजर आते हैं।
लावारिस शवों को उम्र के हिसाब से देती हैं रिश्ते का नाम
अमरजीत कौर ढिल्लों
अंधविश्वास और दूसरी परंपराओं से हटकर अमरजीत कौर लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करती हैं। इनकी कोई एनजीओ नहीं है। हां कुछ लोग इस काम में कभी- कभी आर्थिक मदद जरूर कर देते हैं। फिर भी पूरे तन, मन और धन से ये इस महान कार्य को पिछले 17 सालों से कर रही हैं। शहर में जितने भी लावारिस शव पुलिस को मिलते हैं, शिनाख्त न हो पाने पर उनके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी खुद अमरजीत ही उठाती हैं।
अंतिम संस्कार से पहले वे श्मशान घाट के रजिस्टर पर लावारिस शव को उम्र के हिसाब से रिश्ते का नाम देती हैं। पंजाब एंड सिंध बैंक में 20 साल काम करने के बाद ऐच्छिक रिटायरमेंट लेकर इन्होंने लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का काम शुरू किया। अब तक 500 से अधिक शवों का अंतिम संस्कार करवा चुकी हैं। इस काम में सभी सहयोग करते हैं, लोगों से सहयोग मिलता है।
भाई का परिवार भी इनके साथ ही रहता है। अपनी पेंशन से ही ये लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करती हैं। अमरजीत कौर का कहना है कि महिलाएं घर की जिम्मेदारी के कारण कई बार सामने नहीं आ पातीं लेकिन वो जो भी करती हैं उसमें नफा नुकसान नहीं सोचतीं। इसलिए वे हर औरत को सलाम करती हैं।
ढोल गर्ल 100 से अधिक कर चुकी हैं लाइव शो
देश की पहली फीमेल ढोली जहान गीत सिंह
जहां गीत सिंह जैसाकि नाम से ही जाहिर है कि कौर की बजाय सिंह लगाने वाली जहां गीत काम भी ऐसा करती हैं जो अब तक लड़कों का क्षेत्र माना जाता था।
इनका कहना है कि अपने पिता हरचरण सिंह, माता परमिंदर कौर की बदौलत ही वह यहां तक पहुंचीं। माता-पिता हर कदम पर साथ खड़े रहे। 20 जुलाई 1998 को जन्मीं जहां ने पांच वर्ष पहले गर्मी की छुट्टियों में सिलाई-कढ़ाई, पेंटिग से कुछ अलग हटकर सीखने की सोची और उस्ताद करतार सिंह से ढोल बजाना सीखना शुरू किया। अब तक जहां गीत 100 से ज्यादा लाइव शो कर चुकी हैं।
शुरू में तो वे कहती हैं कि लोग हंसे भी लेकिन जब वह ढोल को लयबद्ध पीटती थीं तो लोगों के रिस्पांस से वह खुद को बहुत गर्वित महसूस करती थीं। कल्चरल ढोल बजाने वाली सभी महिलाओं में जहां सबसे युवा है। पीयू से लॉ कर रही जहां गीत बताती हैं कि शुरू में ढोल उठाना बहुत मुश्किल लगता था लेकिन अब वे इसे चैलेंज के रूप में लेती हैं। वैसे भी लड़कियां किसी भी क्षेत्र में लड़कों से पीछे नहीं हैं।
पानी में कूद जाओ, तैरना खुद आ जाएगा
इंटरनेशनल वूमेन्स डे
यह कहना है मोहाली फेज - 7 इंडस्ट्रियल एरिया में गैरी आट्ïर्स चलाने वालीं गगनदीप कौर का। गगनदीप कौर ऐसी शख्सियत हैं जो अपने पिता का बिजनेस संभाल रहीं हैं। स्कलपचर डॉटर के नाम से प्रसिद्ध गगनदीप कौर ने अपनी दादी सरदारनी भगवान कौर की 9 फुट ऊंची प्रतिमा बनाई थी जिसका उनके पैतृक स्थान ननोकी, पटियाला में 8 मार्च को अनावरण किया गया था।
अभी हाल ही में इन्होंने माई भागो इंडस्ट्री फार वुमन में स्टैचू बनाकर लगाया है। गगनदीप कौर के पति आर्मी आफिसर हैं, अभी फिलहाल में ही इन्होंने आर्मी के लिए बोफोर्स गन भी बनाई है। इनका कहना है कि इनकी कंपनी में 60 के करीब स्टाफ है जिनमें 60 फीसदी महिलाएं हैं। उनका कहना है कि महिलाओं को खुद को बेचारी की परंपरा से बाहर निकलना चाहिए।
एक बार का वाकया बताया, एक पुरुष ने उन्हें टच किया तो उन्होंने थप्पड़ जड़ दिया। महिलाओं को चाहिए कि वे ऐसी चीजों को इग्नोर करने की बजाय उनका सामना करें।
जो आजादी लड़कों को देते हैं वह लड़कियों को भी दें
महावीर फौगाट
पहलवानी के क्षेत्र में गीता फोगाट को कौन नहीं जानता। इन्होंने पहली बार भारत के लिए राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया था। साथ ही गीता पहली भारतीय महिला पहलवान है जिन्होंने ओलम्पिक में क्वालीफाई किया।
23 दिसंबर 2016 को प्रदर्शित हुई हिन्दी भाषी दंगल इन्हीं पर आधारित है, जिसमें इनका किरदार फातिमा सना शेख ने निभाया है जबकि इनके पिता और प्रशिक्षक महावीर फोगाट का किरदार आमिर खान ने निभाया।
महावीर फोगाट से पूछने पर कि नच बलिए का आफर रिजेक्ट कर दिया लेकिन खतरों के खिलाड़ी शो में आपने अपनी बेटी को भेजने की सोची है तो ऐसा क्यों तो उनका कहना है कि आप खुद ही समझदार हो।
मैंने अपनी बेटियों को खतरों से खेलने की ट्रेनिग दी है। इनकी चार बेटियों में से बाकी दो भी इंटरनेशनल में खेलने की तैयारी कर रही हैं। गीता और बबीता फोगाट अब २०३० ओलंपिक की तैयारी में जुटी हैं। कलर्स पर खतरों के खिलाड़ी सीजन-8 जल्द ही शुरु होने वाला है।
महिलाओं को अपनी शक्ति को समझना होगा
हरियाणा की मंत्री कविता जैन
महिला एवं बाल कल्याण मंत्री कविता जैन का कहना है कि महिलाएं तब सुरक्षित होंगी जब महिलाएं अपने बेटे और बेटी में फर्क करना बंद करेंगी। साथ ही महिलाओं को चाहिए कि बचपन से ही अपने बेटों को महिलाओं की इज्जत करना सिखाएं। जब उनसे पूछा गया कि 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओÓ अभियान तो शुरू कर दिया लेकिन बेटियों की सुरक्षा को लेकर क्या प्लान है, इस पर कविता जैन का कहना है कि इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को सामने आना होगा। महिलाओं की सुरक्षा के लिए जिला मुख्यालयों पर थाने बनाए गए हैं।
महिला पुलिस कर्मियों की संख्या भी बढ़ाई जा रही है। इस बजट में ७ जिलों में वन स्टाप सेंटर खोले जा रहे हैं। करनाल और महेंद्रगढ़ में घरेलू हिंसा रोकने के लिए महिला पुलिस प्रहरी लगाई गईं हैं। कविता का कहना है कि इनका एक पुत्र व एक पुत्री है। इन्होंने दोनों में कभी कोई अंतर नहीं किया। नैतिक शिक्षा भी जरूरी है। इनके पति श्री राजीव जैन के मोबाइल की रिंगटोन भी बेटियों की व्यथा दर्शाती है। राजीव जैन के मोबाइल की टोन 'गर्भ तै बाहर निकड़ कै हिंदुस्तान देखना चाहुं सूं ... से भी साफ झलकता है कि दोनों पति-पत्नी बेटियां बचाने को लेकर कितने जागरूक हैं।
इस महिला ने नाटक में दिखाई जिंदगी की उड़ान
इंटरनेशनल वूमेन्स डे
कविता चौधरी पिता पर होने वाले जुल्म को जिस तरह टीवी धारावाहिक उड़ान (2008) में दिखाया उसे देख हर बेटी खुशी से रोई। कविता कहती है कि महिलाओं को भी उतनी ही आजादी है जितनी पुरुषों को। अधिकार पाना है तो अधिकार के लिए लडऩा होगा। कविता पहली डायरेक्टर हैं जिन्होंने खुद सीरियल बनाया और खुद ही लीड रोल किया।
महिला लड़े हक की जंग
किरण बेदी देश की पहली आईपीएस हैं। पिछले दिनों अमृतसर आगमन पर कहती हैं कि महिलाओं को हक की जंग लडऩी चाहिए। महिला अब अबला नही है। संविधान ने बराबर का हक दिया है।
खुशी है देश के लिए वर्दी पहनी
कंचन भट्टाचार्य व कविता चौधरी दोनों सगी बहनें हैं। कंचन व कविता चौधरी दोनों पिता एमएम चौधरी के खिलाफ झूठे पुलिस मामले के बाद ठाना था कि वो पापा को न्याय दिलाएंगी। कंचन देश की पहली डीजीपी (उत्तराखंड, 2002 में सेवामुक्त) बनी। मुंबई रहती हैं। कहती हैं कि खुशी है देश के लिए वर्दी पहनी।
भारत की बेटी हूं, भारती नाम है मेरा
मैं भारत की बेटी हूं, भारती नाम है मेरा। अपने शब्दों से दुनिया को हंसाने वाली भारती पहली बार अमृतसर में रोई। उसका जन्म अमृतसर का है। बालीवुड से लेकर छोटे परदे पर हंसी बिखेरने वाली भारती कहती है कि महिला के लिए रोज ही दिवस होता है, एक दिन महिला दिवस का क्या औचित्य।