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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: कोरोना में काम पर पड़ा असर तो चलाने लगी टैक्सी... पढ़ें जज्बे और जुनून की कहानियां

Sat, 08 Mar 2025 09:58 AM IST
निवेदिता वर्मा अमर उजाला नेटवर्क, चंडीगढ़

सार

महिलाएं किसी से कम नहीं होती। माता-पिता को भी चाहिए कि लड़कियों को सपोर्ट करना चाहिए। महिलाओं को अगर परिवार और अपनों का साथ मिले तो वे कोई भी मुकाम हासिल कर सकती हैं।
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निशा शर्मा और ज्योति - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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न संघर्षों से हार मानी, न हिम्मत और हौसलों को कम होने दिया। बल्कि अपनी लगन, काबिलियत और मेहनत के बल पर कामयाबी की राह पर ऊंचा मुकाम बनाया। महिला दिवस पर आइए आपको मिलाते हैं ट्राइसिटी की कुछ ऐसी ही साहसी महिलाओं से  

कोरोना में सैलरी घटी तो ड्राइविंग चुनी

कहते हैं, हौसला अगर मजबूत हो तो कोई भी राह मुश्किल नहीं होती। जीरकपुर की रहने वाली निशा शर्मा ने इस बात को सच कर दिखाया। 19 और 17 वर्ष दो बेटों की मां निशा की जिंदगी एक आम नौकरीपेशा महिला की तरह चल रही थी, लेकिन फिर आया कोरोना काल, जिसने न सिर्फ रियल एस्टेट में उनकी नौकरी को प्रभावित किया, बल्कि उनकी सैलरी भी घटा दी। आर्थिक चुनौतियां बढ़ीं, लेकिन निशा ने हार मानने की बजाय एक नया रास्ता टैक्सी ड्राइविंग का चुना।

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शुरुआत में समाज ने सवाल उठाए कि महिला होकर टैक्सी कैसे चलाएगी, पहाड़ों पर गाड़ी संभाल पाएगी... लेकिन निशा ने इन सवालों का जवाब अपने हौसले और मेहनत से दिया। उन्होंने पहले रेंट पर गाड़ी लेकर ट्राइसिटी रूट पर टैक्सी चलानी शुरू की। वह तीन साल से गाड़ी चला रही हैं। एक साल पहले ही उन्होंने अपनी गाड़ी खरीदी है और उसे चलाती हैं। पति भी टैक्सी चालक हैं। 

निशा ने कहा कि उन्होंने तीन दिन में गाड़ी चलानी सीखी। धीरे-धीरे पहाड़ों की ऊंची-नीची सड़कों पर भी सफर तय करने लगीं। आज वे मनाली, कसौल, धर्मशाला, डलहौजी, किन्नौर जैसे मुश्किल रास्तों पर सवारियों को सफर करवाती हैं। उन्होंने बताया कि कई बार सवारी डर जाती है कि एक महिला कैसे इतनी दूर जाएगी और पहाड़ों पर गाड़ी कैसे चलाएगी। कहीं गिरा तो नहीं देगी लेकिन जब सफर पूरा होता है कि लोग तारीफ करके जाते हैं कि इतने अच्छे से तो कई पुरुष भी गाड़ी नहीं चलाता। उन्होंने बताया कि हिमाचल व अन्य जगहों पर जाती हैं तो वहां के लोग भी हैरान होते हैं लेकिन हिम्मत की दाद भी देते हैं। कहा कि अब तक अनुभव बहुत अच्छा रहा है।
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अगर हिम्मत हो तो हालात बदले भी जा सकते हैं...
निशा का सफर आसान नहीं था। पहाड़ी रास्तों पर ड्राइविंग करना चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन उन्होंने हर चुनौती को स्वीकार किया और खुद को साबित किया। आज वे न केवल ट्राइसिटी की पहली महिला टैक्सी ड्राइवर हैं, बल्कि उन तमाम महिलाओं के लिए एक मिसाल भी हैं, जो समाज की बंदिशों को तोड़कर अपने सपनों को उड़ान देना चाहती हैं। उनकी कहानी हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है, जो सोचता है कि हालातों से मजबूर होकर ही जिया जा सकता है। निशा ने दिखा दिया कि अगर हिम्मत हो, तो हालात बदले भी जा सकते हैं और नया मुकाम भी पाया जा सकता है।

चंडीगढ़ की सबसे पुरानी महिला बांउसर की कहानी

लोगों के ताने की परवाह किए बगैर महिला बाउंसर रूपाली ने बेटे की अच्छी परवरिश दी। हाल ही कॅरिअर की तलाश में उनका बेटा दुबई गया है। रूपाली ने बताया कि उनका एक बेटा है। वह जॉब की तलाश में थी। एक जानकार उन्हें बिना बताए ड्यूटी पर ले गया। जब वहां पहुंची तो बाउंसर की ड्यूटी लगा दी। धीरे-धीरे और महिलाएं भी जुड़ती गईं। आज रूपाली को 15 से अधिक साल बाउंसर की ड्यूटी करते हो गया है। रूपाली ने बताया कि क्लब में शराब पीकर लड़कियां उलझ जाती हैं। कभी सुनना और सहना भी पड़ता है। लेकिन आज सुकून इस बात का है कि बच्चे को पढ़ा-लिखाकर इस काबिल बना दिया कि वह आराम से नौकरी कर रहा है।

टांग की हड्डी टूटने के बाद भी नहीं मानी हार, अब कर रही फूड डिलीवरी 

औरत अगर ठान ले तो वह कुछ भी कर सकती है। यह कहना है मोहाली निवासी ज्योति का। उन्होंने बताया कि वह सिंगल मदर हैं। उनके पति के छोड़ जाने के बाद तीन बच्चों की जिम्मेदारियां उन पर आ गई। तब उन्होंने फैसला किया कि वह फूड डिलीवरी करेंगी। इस दौरान वे सड़क दुर्घटना में घायल हो गई। हादसे में उनकी टांग की हड्डी टूट गई, जिसके बाद 4 महीने तक वह बेड पर रही। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वह दोबारा ठीक होकर काम पर गई।

उन्होंने कहा कि उनकी बड़ी बेटी 12वीं कक्षा, छोटी दसवीं और सबसे छोटा बच्चा भी पढ़ रहा है। उनके पास आय का कोई साधन नहीं था, इसलिए वह जॉब नहीं छोड़ सकती थी। जब वह फूड ऑर्डर लेकर जाती है तो टांग में रोड होने के कारण वह सीढि़यां नहीं चढ़ पाती। लोग भी उनसे आर्डर लेने नीचे नहीं आते, ऐसे में उन्हें कई तरीके की समस्याएं झेलनी पड़ती है, लेकिन उनका मानना है कि औरत अगर ठान ले तो वह कुछ भी कर सकती है। बस उसके हौसले बुलंद होने चाहिए।

गोल्फर्स को जीत के टिप्स देती हैं कैडी आरती

गोल्फ कोर्स पर कैडी का काम करते हुए आरती मिश्रा गोल्फरों को जीतने का टिप्स देती हैं। वह गोल्फ खिलाड़ी के तौर पर अपना कॅरिअर बढ़ाना चाहती थी, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के चलते आगे नहीं आ पाईं। गोल्फ में बेहतर खेल दिखाते हुए उन्होंने चंडीगढ़, पंचकूला और मोहाली में खेले गए गोल्फ टूर्नामेंट और चैंपियनशिप में 20 के करीब ट्राॅफियां भी जीती हैं। गोल्फ खेल के प्रति उनमें जुनून है। कैडी के तौर पर मिलने वाले पैसों से कंप्यूटर का कोर्स कर रही हैं।

उन्होंने बताया कि वह चंडीगढ़ गोल्फ क्लब में शहर के गोल्फ खिलाड़ियों और क्लब मेंबर्स को इन दिनों गोल्फ कोर्स पर गोल्फ खिलाने का काम रही है। बीए तक की पढ़ाई कर चुकी आरती ने बताया कि चंडीगढ़ गोल्फ रेंज के पूर्व प्रधान ने कैडी के लिए आवेदन मांगे थे। इसमें कुल 16 आवेदन आए, जिनमें 4 लड़कियां और 12 लड़के शामिल रहे। उन्होंने 15 दिन तक ट्रेनिंग ली। इस दाैरान उन्हें खेल से लगाव हो गया। इसके बाद सीजीए की ओर से गोल्फ टूर्नामेंट में शिरकत करानी शुरू कर दी। उनका कहना है अगर उन्हें सपोर्ट मिलता है तो वह आगे भी गोल्फ खेलना चाहती है।  आरती ने बताया कि वह नयांगाव में रहती हैं। उनके पिता घर पर ही रहते हैं और मां गृहिणी हैं। उनका भाई सेक्टर- 17 में प्राइवेट लिफ्ट मैन का काम करता है, जिससे परिवार का खर्चा चल रहा है।

31 साल से शिक्षा के क्षेत्र में कुलदीप कर रहीं सेवा

महिला शक्ति अपने दृढ़ इरादे से यदि कुछ करने की ठान ले तो वह कर लेती है। आज से करीब 31 साल पहले 1994 में पंजाब के छोटे से कस्बे जीरा (फिरोजपुर) से चंडीगढ़ में आकर शिक्षा को समर्पित महिला कुलदीप शुक्ला ने कॉलोनी एवं गांव के बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया था।

उन्होंने घर-घर जाकर बच्चों को शिक्षित करने के लिए लोगों को जागरूक किया और 10 बच्चों के लिए मौली गांव में किराए के एक कमरे से दीप पब्लिक स्कूल की शुरुआत की। तब इस एरिया में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले लोग अपने बच्चों को कम ही पढ़ने के लिए भेजते थे। कुलदीप शुक्ला ने उनको शिक्षा का महत्व बताया। खास कर लड़कियों की शिक्षा पर जोर दिया जिसमें वे काफी हद तक सफल भी हुईं और दीप पब्लिक स्कूल मौली गांव के माध्यम से आस-पास की कॉलोनी के गरीब परिवारों के बच्चों को मामूली फीस लेकर शिक्षा दी।

वहीं इसके साथ-साथ उन्होंने खुद भी शिक्षा के क्षेत्र में देश के 100 बेस्ट प्रिंसिपल, शिक्षा रतन एवं अपराजिता और एजुकेशन वर्ल्ड अवार्ड और स्कूल विजनरी जैसे अवॉर्ड बंगलूरू, मुंबई, दिल्ली धर्मशाला आदि स्थानों पर अर्जित किए। गरीब एवं जरूरतमंद बच्चों को शिक्षित करने का प्रण स्कूल स्थापित कर पूरा करने का निश्चय इन्होंने बचपन में ही सोच लिया था। महिला दिवस पर उनका यह संदेश आने वाली पीढ़ी के लिए है कि नारी कभी भी अबला नहीं थी। वह नामुमकिन को मुमकिन बना सकती है।
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यूएन मिशन पर गई महिला एसआई विदेश में पढ़ा रहीं कानून का पाठ

यूटी पुलिस की महिला सब इंस्पेक्टर विदेश में कानून का पाठ पढ़ा रही हैं। एसआई चंद्रमुखी यूएस मिशन के दौरान जुबा साउथ सूडान जाकर महिलाओं को दुष्कर्म और छेड़छाड़ की घटना के प्रति जागरूक कर रही हैं। स्कूलों में जाकर बच्चों को जागरूक कर रही हैं। जुबा पुलिस को भी दुष्कर्म और छेड़छाड़ के मामलों में जांच करने के लिए ट्रेनिंग दे रही हैं। सूडान में लोग इसके प्रति जागरूक नहीं है। एसआई चंद्रमुखी मई में यूएस मिशन के लिए सुडान गई थी। कठिन परीक्षा के बाद एसआई चंद्रमुखी का यूएन मिशन के लिए चयन हुआ था। चंद्रमुखी चंडीगढ़ में पीजीआई चौकी इंचार्ज रह चुकी हैं। चंडीगढ़ में रहते हुए उन्होंने कई छेड़छाड़ और दुष्कर्म के मामलों में आरोपियों को सलाखों के पीछे ही नहीं बल्कि सजा भी दिलाई है।
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