हिमालयन इकोलॉजी पर अंतरराष्ट्रीय डायलॉग के दौरान रविवार को जलवायु परिवर्तन और खेती के भविष्य पर विचार-विमर्श किया गया। जल संसाधनों पर बढ़ने दबाव और पर्यावरण कानूनों पर मंथन हुआ। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्निकल टीचर्स ट्रेनिंग एंड रिसर्च में आयोजित सत्र को भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, नई दिल्ली के उप महानिदेशक आनंद शर्मा ने संबोधित किया।
उन्होंने कहा कि मौजूदा मॉडल हिमालय में तापमान में परिवर्तन का आकलन करने में असमर्थ हैं। इसलिए हमें क्षेत्रीय जलवायु मॉडल की जरूरत है। उच्च संसाधन जलवायु मॉडल पीआरईसीआईएस मानसून के छोटे पैमाने की विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करने में अच्छा कौशल दिखाता है।
उन्होंने जून 2012 में उत्तराखंड की सबसे बड़ी जलवायु परिवर्तन आपदा के बारे में चिंता जताई। साथ ही कहा कि जलवायु परिवर्तन को दोष देने के बजाय हमें यह सोचना चाहिए कि दोषी हम हैं, जिन्होंने ये हालात पैदा होने दिए। पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट देहरादून के पूर्व निदेशक रवि चोपड़ा ने कहा कि चार धाम राजमार्ग जैसी परियोजनाएं पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही हैं।
जल संरक्षण से पहले पानी का दोहन, स्प्रिंग शेड और वाटर शेड प्रबंधन को अधिक विवेकपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिए। हिमपात और हिमस्खलन अध्ययन प्रतिष्ठान चंडीगढ़ के डॉ. पीएस नेगी ने बताया कि पिछले कुछ सालों से सब कुछ बदल रहा है। इसी कारण तापमान में बदलाव आ रहा है, बर्फ की कवरेज वाले क्षेत्र में कमी आ रही है।