पीजीआई में रोजाना हजारों की संख्या में चंडीगढ़ ही नहीं बल्कि हरियाणा, पंजाब, जम्मू सहित हिमाचल से भी मरीज अपना इलाज करवाने के लिए आते है। पीजीआई में रोजाना मरीजों की इतनी मारामारी होती है कि वाहनों में आने वाले मरीजों और तिमारदारों के पास अपनी गाड़ी पार्क करने तक के लिए जगह नहीं होती है।
दूर-दूर के राज्यों से चंडीगढ़ पीजीआई में इलाज के लिए आने वाले मरीजों को एक बार में इलाज तो मिल नहीं पाता लेकिन उनकी जेब पर पार्किंग ठेकेदार द्वारा डाका जरूर डाल दिया जाता है।
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पीजीआई में बिना पार्किंग के खड़ी गाड़ियों को ठेकेदार के कारिंदे रिकवरी वैन के जरिए उठा ले जाते है और उन्हें बाद में छोड़ने की एवज में 300 से 1100 रुपये तक ऐंठे जाते हैं। रोजाना रिकवरी वैन के जरिए 70 से 80 गाड़ियों को उठाया जाता है और बाद में गाड़ी चालक से जितने में सेटिंग हो जाए, उतने पैसे निकलवा लिए जाते हैं। जबकि पीजीआई प्रबंधन ने दोपहिया वाहन चालक से 50 और चौपहिया वाहन के लिए 100 रुपये जुर्माना निर्धारित किया हुआ है। इस अवैध वसूली से पीजीआई के अधिकारी और पुलिस भी अनभिज्ञ नहीं हैं। जाहिर है कि अफसरों की शह पर ही यह अवैध वसूली का खेल लंबे समय से चल रहा है।
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दरअसल पीजीआई में रोजाना हजारों की संख्या में चंडीगढ़ ही नहीं बल्कि हरियाणा, पंजाब, जम्मू सहित हिमाचल से भी मरीज अपना इलाज करवाने के लिए आते है। पीजीआई में रोजाना मरीजों की इतनी मारामारी होती है कि वाहनों में आने वाले मरीजों और तिमारदारों के पास अपनी गाड़ी पार्क करने तक के लिए जगह नहीं होती है। ऐसे में मरीज या फिर उनके परिजन वाहनों को सड़क के एक किनारे पार्क करके इलाज करवाने चले जाते है। लेकिन इसी बीच पीजीआई में पार्किंग ठेकेदार के कारिंदे अपनी रिकवरी वैन लेकर पहुंच जाते है और सड़क किनारे बिना पार्किंग खड़ी कारों व अन्य वाहनों को उठाकर अपने साथ ले जाती है।
जब्त की गई गाड़ियों को जंजीर के अंदर ताले में रखा जाता
जब इलाज के लिए आए मरीज या उनके परिजन इलाज करवाकर वापस अपनी गाड़ी के पास पहुंचते है तो उन्हें वहां अपनी गाड़ी ही नहीं मिलती है। गाड़ी गायब देखकर लोगों का शक सीधे उनकी गाड़ी चोरी पर जाता है और वह इधर-उधर अपनी गाड़ियों को तलाश करने में लग जाते है। लेकिन बाद में पता चलता है कि उनकी गाड़ी को बिना पार्किंग के बाहर खड़ा करने पर ठेकेदार के कारिंदे उठाकर ले गए हैं। इसके बाद अपनी गाड़ियों को ढूंढते हुए वहां पहुंचते है, जहां कारिंदे उनकी गाड़ियों को लोहे की जंजीर के अंदर ताला लगाकर बंद करते है ताकि कोई भी व्यक्ति बिना हर्जाना दिए यहां से अपनी गाड़ी न लेकर जा सकें।
डॉक्टरों को छूट, चाहे बीच सड़क खड़ी कर दे अपनी गाड़ी
ठेकेदार को इलाज करवाने आए मरीज या उनके परिजनों की गाड़ियां तो बिना पार्किंग के बाहर सड़क पर खड़ी दिख जाती है। लेकिन अगर किसी डॉक्टर या अन्य स्टाफ की गाड़ी बिना पार्किंग के सड़क पर खड़ी हो तो उस पर पार्किंग ठेकेदार के कारिंदे या पीजीआई के सुरक्षा कर्मियों की नजर इन गाड़ियों पर नहीं पड़ती है। पीजीआई के सुरक्षा कर्मियों द्वारा भी रिकवरी वैन वालों को फोन करके बिना पार्किंग के खड़ी गाड़ियों के बारे में सूचना दी जाती है। लेकिन बात अगर डेढ़ से दो लाख वेतन लेने वाले किसी डॉक्टर या स्टाफ सदस्य की गाड़ी की होती है तो सुरक्षा कर्मी भी आंखें बद कर लेते है। इस तरह कारिंदे व सुरक्षा कर्मी भी भेदभाव करते है।
पीजीआई प्रबंधन ने निर्धारित किए हुए हैं जुर्माने के रेट
पीजीआई प्रबंधन की ओर से ठेकेदार को पार्किंग ठेका अलाट करते समय वाहनों को पार्क करने से लेकर बिना पार्किंग के खड़े वाहनों को जब्त करने पर जुर्माने के रेट भी निर्धारित किए हुए है। प्रबंधन के अनुसार तीन व चार पहिया वाहनों के 8 घंटे तक 10 रुपये प्रति विजिट, अधिकतम 24 घंटे तक 25 रुपये, दोपहिया वाहनों के लिए पांच रुपये और साइकिल के लिए दो रुपये रेट रखा गया है। इसके अलावा अगर कोई वाहन चालक बिना पार्किंग के कोई वाहन खड़ा करता है तो उसमें दोपहिया वाहन चालक से 50 रुपये और चार पहिया वाहन चालक से 100 रुपये जुर्माना वसूला जा सकता है। बाकायदा यह बोर्ड भी पार्किंग ठेकेदारों के शेड पर लगे हुए हैं।
मनमाने ढंग से वाहन चालकों से की जाती है अवैध वसूली
जब बिना पार्किंग के खड़ी गाड़ियों को ठेकेदार के कारिंदे उठाकर ले जाते है तो उसके बाद पैसों की अवैध वसूली का खेल शुरू होता है। वाहन चालकों से ठेकेदार के कारिंदे 1100 रुपये हर्जाना देने से शुरू होते है और सामने वाले के मिन्नतें करने व गिड़गिड़ाने पर 500 से 700 रुपये तक हर्जाना वसूल किया जाता है। जबकि ठेकेदार ने कम से कम 300 रुपये जुर्माना वसूलना ही होता है जबकि पीजीआई प्रबंधन की ओर से केवल 100 रुपये जुर्माना निर्धारित किया हुआ है।
अमर उजाला ने खुद अपनी गाड़ी उठवाई तो मांगे 1100 रुपये
इस मामले की सच्चाई जानने के लिए अमर उजाला टीम द्वारा पीडियाट्रिक्स विभाग के सामने सड़क पर बिना पार्किंग के स्विफ्ट गाड़ी खड़ी की। एक सिक्योरिटी गार्ड ने फोन किया और महज 10 मिनट बाद ही रिकवरी वैन हमारी गाड़ी को उठा ले गई। जब टीम मौके पर पहुंची और ठेकेदार के कारिंदे से बातचीत की तो उसने 700 रुपये मांग। बाद में उसने कहा कि चलो 500 ही दे दो। इसके बाद टीम द्वारा मौके पर खड़े होकर ही पीजीआई पुलिस चौकी में फोन किया गया और महिला अधिकारी से बात की गई तो उन्होंने कहा कि ठेकेदार ने 300 रुपये निर्धारित किए हुए है। इसके बाद पीजीआई के एक अधिकारी को फोन किया गया तो उसने भी कहा कि 300 रुपये तो देने ही पड़ेंगे। इसके बाद जब ठेकेदार को टीम ने अपने बारे में बताया तो कारिंदे ने कहा कि चलो आप 100 ही दे दो। इससे साफ जाहिर होता है कि पीजीआई पुलिस चौकी ही नहीं बल्कि पीजीआई के अधिकारी भी ठेकेदार द्वारा की जा रही इस अवैध वसूली के बारे में बखूबी जानते है लेकिन कार्रवाई कोई नहीं करना चाहता है।
इस मामले को लेकर पीजीआई प्रशासन के अधिकारिक प्रवक्ता को फोन किया गया तो उन्होंने मैसेज करने की बात कही। इसके बाद उन्हें मैसेज के जरिए भी मामले में उनका पक्ष पूछा गया लेकिन उन्होंने कोई जवाब देना ही उचित नहीं समझा।