पंजाब निवासी महिला ने याचिका दाखिल करते हुए 2 वर्षीय बेटे के साथ अपने कथित प्रेमी संग अवैध यौन गतिविधियों में शामिल करने के मामले में दर्ज एफआईआर में अग्रिम जमानत की मांग की थी। बच्चे के पिता की शिकायत पर पुलिस ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम की धाराओं में मामला दर्ज किया था।
प्रेमी के साथ मिलकर अपने 2 वर्षीय बेटे का यौन शोषण करने की आरोपी मां को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत का हकदार न मानते हुए उसकी याचिका को खारिज कर दिया है।
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हाईकोर्ट ने कहा कि मां की भूमिका बच्चे की देखभाल और पालन-पोषण करना है, लेकिन इस तरह के आरोप चिंताजनक और शर्मनाक हैं। यह पूरे समाज पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
पंजाब निवासी महिला ने याचिका दाखिल करते हुए 2 वर्षीय बेटे के साथ अपने कथित प्रेमी संग अवैध यौन गतिविधियों में शामिल करने के मामले में दर्ज एफआईआर में अग्रिम जमानत की मांग की थी। बच्चे के पिता की शिकायत पर पुलिस ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम की धाराओं में मामला दर्ज किया था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया गया था कि उसकी पत्नी ने लगभग 4 साल पहले सह-आरोपी के साथ अवैध संबंध विकसित किए थे। उसने हाल ही में अपनी पत्नी के मोबाइल फोन पर अपने 2 साल के बेटे की दो परेशान करने वाली तस्वीरें देखीं। इन तस्वीरों में याचिकाकर्ता का कथित प्रेमी, छोटे बच्चे के साथ दुर्व्यवहार करता हुआ दिखाई दे रहा है।
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हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की हरकतें और आचरण, विशेष रूप से पीड़ित बच्चे की मां के रूप में, बेहद चिंताजनक हैं। यह शर्मिंदगी का कारण बने हैं, जिससे पूरे समाज पर नकारात्मक प्रभाव डाला है। यदि ऐसी हरकतें सच साबित होती हैं, तो यह न केवल एक मां के रूप में उसके कर्तव्यों का उल्लंघन है, बल्कि मां-बच्चे के रिश्ते में निहित कानूनी और नैतिक जिम्मेदारियों के प्रति उपेक्षा भी होगी।
याचिकाकर्ता द्वारा सह आरोपी संग मिलकर किए गए इस अपराध से समाज के ताने-बाने पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। अग्रिम जमानत की राहत का उद्देश्य व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता सुनिश्चित करना है और निर्णय लेते समय न्यायालय को व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा और सामाजिक हितों की रक्षा के बीच संतुलन बनाना होगा। हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपों की गंभीरता और याचिकाकर्ता के आचरण की प्रकृति को देखते हुए कहा कि इस तरह के अपराध की उचित जांच की जानी चाहिए। रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं है जिससे यह माना जा सके कि याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है। अपराध की प्रकृति और गंभीरता तथा याचिकाकर्ता की विशिष्ट भूमिका से यह निष्कर्ष निकलता है कि वह अग्रिम जमानत की रियायत का हकदार नहीं है।