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शव का कोई हिस्सा नहीं था जिस पर जख्म नहीं, यह बर्बरता नहीं तो क्या : हाईकोर्ट

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-समयपूर्व रिहाई की मांग को लेकर रोहतक निवासी राजेश की याचिका हाईकोर्ट ने की खारिज
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-22 साल पहले जज ने लिखा था कि हत्या अति क्रूरतापूर्वक हुई, कोई समझदार व्यक्ति हस्तक्षेप कर मौत को आमंत्रित नहीं करेगा

-यूनिवर्सिटी में दिन दहाड़े पीछा करने के बाद की गई थी हत्या, पूरा शरीर जख्मों से था भरा

अमर उजाला ब्यूरो

चंडीगढ़। हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे राजेश उर्फ राजे को समय पूर्व रिहाई देने की मांग को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि याची ने हत्या करते हुए शरीर का ऐसा कोई हिस्सा नहीं छोड़ा था जिस पर घाव मौजूद न हो, यह बर्बरता नहीं तो और क्या है। याची ने दलील दी थी कि हत्या में बर्बरता नहीं थी ऐसे में उसे समय पूर्व रिहाई दी जाए। याचिका दाखिल करते हुए राजेश ने बताया कि 1998 में हुई हत्या के मामले में 2002 में उम्रकैद की सजा दी गई थी। याची ने कहा कि वह 15 साल की असल व छूट के साथ लगभग 18 साल की सजा काट चुका है और ऐसे में उसे समयपूर्व रिहाई दी जाए। उसको बर्बरता से हत्या का दोषी बताया जा रहा है जबकि तय मानकों के तहत वह इसका दोषी नहीं है। बर्बरता के मामले में शव को टुकड़े-टुकड़े करना या उसे जलाना आते हैं जबकि याची ने ऐसा नहीं किया था। सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याची को जब पहली और दूसरी बार पैरोल मिली तो दोनों बार वह भाग गया था और सरेंडर नहीं किया था। हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि बर्बरता को लेकर दर्ज केवल उपरोक्त मानक नहीं हैं बल्कि यह हर केस के तथ्यों पर निर्भर करती है। याची ने रोहतक यूनिवर्सिटी में बड़ी दूर तक व्यक्ति का पीछा किया और फिर दिनदहाड़े उसकी हत्या कर दी। दहशत का माहौल ऐसा था कि किसी ने भी आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं दिखाई। मेडिकल रिपोर्ट से साफ है कि मृतक के शरीर पर ऐसा कोई हिस्सा नहीं था जिसमें घाव न हो। ऐसे में यह निश्चित रूप से बर्बर तरीके से हत्या का मामला था। 22 साल पहले ट्रायल कोर्ट के जज ने अपने आदेश में यह तक लिखा था कि अति क्रूरतापूर्वक हुई, कोई समझदार व्यक्ति हस्तक्षेप कर मौत को आमंत्रित नहीं करेगा। ऐसे में याची किसी भी प्रकार के रहम का हकदार नहीं है।
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