राज्य के विशेष अधिकारों का उल्लंघन: सीएम
मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने सदन में कहा कि इस वाटर सेस से भागीदार राज्यों पर प्रति वर्ष 1200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा। इसमें से लगभग 336 करोड़ रुपये का बोझ हरियाणा राज्य पर पड़ेगा। यह सेस न केवल प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य के विशेष अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि बिजली उत्पादन के लिए अतिरिक्त वित्तीय बोझ भी पड़ेगा। इससे बिजली उत्पादन की लागत भी अधिक होगी।
प्रति यूनिट एक रुपये से अधिक करना होगा भुगतान
हरियाणा को बीबीएमबी से वर्तमान में 59 पैसे प्रति यूनिट की दर से बिजली मिल रही है। नाथपा झाकड़ी से मिलने वाली बिजली की दर 2.36 रुपये प्रति यूनिट है। इसी तरह एनएचपीसी से मिलने वाली बिजली 2 से 2.5 रुपये प्रति यूनिट तक है। यदि सेस लगता है तो प्रत्येक परियोजना पर एक रुपये कुछ पैसे प्रति यूनिट अधिक देना पड़ेगा। इसका कुल बोझ 336 करोड़ रुपये तक जाने का अनुमान है।
कोई राज्य अकेले नहीं ले सकता निर्णय
चूंकि जल विद्युत परियोजना अकेले एक राज्य से संबंधित फैसला नहीं है। 1960 के सिंधु जल समझौते के कारण केंद्र सरकार के पास इस मामले में हस्तक्षेप के अधिकार है। लिहाजा कोई राज्य अकेले इस संदर्भ में फैसला नहीं कर सकता। हरियाणा सरकार ने इस मामले में केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है।
पंजाब में भी प्रस्ताव का विरोध, विधानसभा में प्रस्ताव पारित
पंजाब सरकार ने भी हिमाचल प्रदेश सरकार के वाटर सेस लगाने के प्रस्ताव का विरोध किया है। बुधवार को विधानसभा ने मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश सरकार के फैसले की निंदा की गई। सदन में पंजाब के जल संसाधन मंत्री गुरमीत सिंह मीत हेयर की ओर से रखे गए प्रस्ताव का समर्थन करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह पंजाब के हितों से बड़ा धोखा है।
इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने ने कहा कि सुक्खू सरकार का यह कदम गैर-कानूनी और तर्कहीन है। नदियों के पानी पर पंजाब का कानूनी हक है और कोई भी राज्य का यह हक नहीं छीन सकता। अपनी जमीन के रास्ते बह रहे पानी पर पंजाब एक पैसा भी किसी को नहीं देगा। पंजाब विधानसभा में हिमाचल प्रदेश सरकार के फैसले के विरोध में प्रस्ताव पास किया गया।