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रणनीति कामयाब: कांग्रेस जीती पर धुल न सका क्रॉस वोटिंग का दाग, बौद्ध की जीत से बची हुड्डा की साख; हार का बदला

Tue, 17 Mar 2026 12:07 PM IST
Sharukh Khan आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार कर्मवीर सिंह बौद्ध की जीत ने हार का दाग मिटा दिया। कांग्रेस ने 2016 और 2022 की हार का बदला लिया है। हाईकमान की नजरों में हुड्डा की हैसियत बढ़ गई है।
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Haryana Rajya Sabha Polls - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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क्रॉस वोटिंग की आशंकाओं और सियासी अटकलों के बीच कांग्रेस उम्मीदवार कर्मवीर सिंह बौद्ध की जीत ने न केवल पार्टी को राहत दी है, बल्कि नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा के राजनीतिक कद को भी नई मजबूती प्रदान की है। 
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इस चुनाव से पहले जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा था, उससे यह साफ था कि मुकाबला आसान नहीं होगा। हरियाणा की राजनीति में क्रॉस वोटिंग का इतिहास रहा है और कांग्रेस भी अतीत में इसका खामियाजा भुगत चुकी है। 

ऐसे में पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों को एकजुट रखना और मतदान के दिन तक रणनीतिक अनुशासन बनाए रखना था। इस पूरे अभियान में भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने फ्रंटफुट पर रहकर नेतृत्व किया।
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हुड्डा ने संभावित क्रॉस वोटिंग को रोकने के लिए जो रणनीति अपनाई, वह आखिरी क्षण में कामयाब रही और भाजपा उसमें सेंध लगाने में सफल नहीं हुई। कांग्रेस विधायकों को पहले ही हिमाचल प्रदेश भेज देना और मतदान से ठीक पहले उन्हें वापस लाना इस बात का संकेत था कि पार्टी इस बार कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं थी। 

 

हुड्डा की रणनीति कारगर
यह कदम भले ही राजनीतिक तौर पर थोड़े असहज करने वाले लगते हैं, मगर परिणामों ने साबित कर दिया कि हुड्डा की यह रणनीति कारगर रही। कर्मवीर सिंह बौद्ध की जीत कांग्रेस संगठन के भीतर नेता प्रतिपक्ष की स्थिति को और मजबूत करती है। 

 

जिस तरह से साल 2016 व 2022 और फिर विधानसभा चुनाव में हार हुई थी, उससे न सिर्फ हुड्डा की साख पर असर डाला बल्कि उनकी रणनीति पर भी सवाल उठने लगे थे।

 

हुड्डा को जब नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किया गया था तो उस दौरान उन्होंने हाईकमान को भरोसा दिलाया था कि कांग्रेस के सभी विधायकों में उनकी पकड़ मजबूत है। ऐसे में पुरानी हार के दाग और हाईकमान के सामने खुद को साबित करने के लिए हुड्डा के सामने करो व मरो की स्थिति थी।

2016 का चर्चित स्याही कांड हरियाणा की राजनीति में आज भी याद किया जाता है। जिसमें कांग्रेस के 14 वोट अमान्य घोषित हो गए थे। वहीं, 2022 के राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग के कारण कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय माकन की हार ने पार्टी को गहरा झटका दिया था। 

 

कर्मवीर सिंह बौद्ध की जीत उसका उदाहरण
उस हार के बाद हुड्डा की रणनीतिक क्षमता पर सवाल उठने लगे थे और हाईकमान के सामने उनकी स्थिति भी असहज हो गई थी। मगर राजनीति में परिस्थितियां स्थायी नहीं होतीं। कर्मवीर सिंह बौद्ध की यह जीत उसी का उदाहरण है। 

 

ऐतिहासिक जीत ने कांग्रेस के आत्मविश्वास को बढ़ाया
इस परिणाम ने न केवल कांग्रेस के आत्मविश्वास को बढ़ाया है, बल्कि भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए भी यह एक तरह की राजनीतिक वापसी साबित हुई है। इस पूरे चुनाव में दीपेंद्र सिंह हुड्डा की सक्रियता भी उल्लेखनीय रही। 

 
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उन्होंने फ्रंटफुट पर आकर संगठन और विधायकों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा और चुनावी गणित को संतुलित करने में अहम भूमिका निभाई। ने वाले समय में हरियाणा की राजनीति में इस जीत के दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।
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