हरियाणा में पंचायत चुनाव लड़ने वालों के लिए शैक्षणिक समेत अन्य योग्यताएं निर्धारित करने को प्रदेश की खट्टर सरकार ने जायज बताते हुए इसे प्रगतिशील कदम करार दिया है। राज्य सरकार का कहना है कि लोग नेताओं का अनुसरण करना चाहते हैं, लिहाजा उनका शिक्षित होना जरूरी है। इसके जरिए पंचायत को मिसाल कायम करनी चाहिए।
सरकार का कहना है कि अब तो बिना शिक्षित हुए खेती भी नहीं की जा सकती। सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी। हरियाणा पंचायती राज (संशोधन) अधिनियम, 2015 की वैधता को चुनौती वाली याचिका पर बहस के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त रखने, स्वच्छता बनाए रखने और समाज को प्रगतिशील बनाने के लिए उम्मीदवारों के लिए मानदंड तो होने ही चाहिए।
यह विधायिका द्वारा उठाया गया कदम है और यह सब संविधान के दायरे में रहकर किया गया है। मकसद इसके जरिए अगली पीढ़ी को शिक्षित बनाना है।
मील का पत्थर साबित होंगे नए नियम
नए नियम के तहत पंचायत चुनाव लड़ने के लिए सामान्य वर्ग के लिए 10वीं और महिलाओं व दलित वर्ग के लिए आठवीं पास होना अनिवार्य कर दिया गया है। न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता निर्धारित करने के साथ-साथ कई अन्य नियम हैं। इसके तहत वे लोग ही पंचायत चुनाव में उम्मीदवार हो सकते हैं, जिनके घरों में शौचालय हो और उन पर बिजली बिल लंबित न हो।
साथ ही उसे किसी भी बैंक का डिफॉल्टर नहीं होना चाहिए। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि पंचायत चुनाव के लिए राज्य सरकार अतिरिक्त योग्यता निर्धारित कर सकती है। राज्य सरकार का यह प्रयास मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने कहा कि चुनाव लड़ने का अधिकार होने का यह मतलब नहीं है कि उसे शिक्षित नहीं होना चाहिए।
जिम्मेदारी निभाने के लिए शिक्षित होना जरूरी
अटॉर्नी जनरल ने कहा कि पंचायत निकाय स्वशासन का एक हिस्सा है। सरपंच या उप सरपंच को नौकरशाही के साथ मिलकर काम करना होता है। सामाजिक न्याय दिलाने के लिए उन्होंने विभिन्न योजनाओं के बारे में पता होना चाहिए। ये जिम्मेदारी वाले पद हैं। इतनी बड़ी जिम्मेदारी को निभाने के लिए उनका शिक्षित होना जरूरी है, ताकि वे अपने कामों को बखूबी अंजाम दे सकें।
अटॉर्नी जनरल ने कहा कि आजादी के वक्त देश में करीब 80 फीसदी लोग निरक्षर थे। अफसोस की बात है कि इतने सालों के बाद भी देश में लोग निरक्षर हैं। ऐसे में अगर पंचायत चुनाव लड़ने वालों के लिए शैक्षणिक योग्यता रखी गई है तो गलत क्या है।
इससे लोगों में शिक्षा के प्रति रुझान बढ़ेगा। आखिर कभी न कभी किसी न किसी को इसकी शुरुआत तो करनी ही थी। यह एक शुरुआत है और संसद और विधानसभा को भी इसका अनुसरण करना चाहिए।
लोगों को शिक्षित होने की प्रेरणा मिलेगी
अटॉर्नी जनरल ने यह भी कहा कि चुनाव लड़ने का अधिकार और चुने जाने का अधिकार असीम नहीं है। इस तरह की अनिवार्यता आम लोगों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करेगा।
कोर्ट हमेशा से कहती रही है कि शिक्षा जरूरी है, ऐसे में इसका विरोध क्यों किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यहां तक खेती करने के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी हो गया है।
वहीं पंचायत चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के घर में शौचालय होने की अनिवार्यता का बचाव करते हुए अटॉर्नी जनरल ने कहा कि यह दुर्भाग्य है कि अब भी लोग खुले में शौच करने को मजबूर है। उन्होंने शौचालय होने को स्वच्छता का हिस्सा बताया। लोगों को इससे प्रेरणा मिलेगी।