सरकार भले ही शर्तें लगाकर पंचायत चुनाव में चौधर की राह कठिन कर रही हो, लेकिन कुछ गांवों में भाईचारा आज भी चुनाव पर भारी पड़ रहा है। जिले का छोटा सा गांव घिलौड़ खुर्द नजीर बनकर उभरा है। जहां दादा-दादी की चुनाव लड़कर भी सरपंच बनने की इच्छा पूरी नहीं हो सकी।
वहीं, बीटेक पास पोता बिना चुनाव लड़े ही 22 साल की उम्र में सरपंच बन गया। अनौपचारिक बैठक में सरपंच ने शराब बंदी की बात कहकर अपनी इच्छा भी जाहिर कर दी। ग्राम सभा की पहली औपचारिक बैठक में इस पर मुहर भी लगा दी जाएगी। घिलौड़ खुर्द गांव में रहने वाले दीपक कौशिक की उम्र 22 साल है।
कौशिक बीटेक की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं। उसके पिता रामनिवास शर्मा हरियाणा पुलिस में सेवारत हैं, जो अपनी नौकरी के साथ ही गांव में समाज सेवा भी करते है। दीपक के दादा रघुबीर ने 1995 में सरपंची का चुनाव लड़ा था, लेकिन वे हार गए। वहीं, दीपक की दादी राजबाला ने 2010 में चुनाव लड़ा और वे भी 13 वोट से हार गईं।
दोनों ही चुनाव लड़कर भी सरपंच नहीं बन सके। लेकिन इस बार दीपक ने शैक्षिक शर्त लगने के बाद नामांकन किया, जिसके सामने गांव के दो और लोगों ने नामांकन किया। लेकिन गांव में पंचायत हुई।
कहा गया कि दीपक के परिवार वालों ने गांव में काफी सहयोग दिया है और उनकी गांव में सरपंच बनने की इच्छा है, जो आज तक पूरी नहीं हो सकी। कहा गया कि अगर सर्वसम्मति से पंचायत चुनते हैं तो सरकार ईनाम भी देगी।
इस तरह बाकी दोनों ग्रामीणों ने अपने नामांकन वापस ले लिए और दीपक को निर्विरोध सरपंच चुन लिया गया। उसके साथ ही अमित, सोनिया, अनीता, निर्मला, रमेश, रानी और नरेंद्र को पंच चुना गया। इस तरह पूरी पंचायत को निर्विरोध चुन लिया गया।