उधर, टिकट वितरण के दौरान ही भूपेंद्र सिंह के धुर विरोधी पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर ने हुड्डा के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए चुनाव जैसे नाजुक वक्त पर पार्टी छोड़ दी और खुलेआम विरोधियों संग जा मिले। अब चूंकि चुनाव में कांग्रेस की कमान हुड्डा के हाथ हैं, पार्टी में खुलकर बगावत भी हुई, लोकसभा चुनाव पिता-पुत्र दोनों हारे, उसके बावजूद भूपेंद्र सिंह फिर मैदान में हैं। हरियाणा में एक बार फिर हुड्डा का जादू जरूर चलता दिख रहा है।
मोदी ने हर इलाके में मतदाताओं को प्रभावित करने वाले मुद्दों को मंच से प्रभावशाली ढंग से उछाला और प्रदेश की जनता को यह बताने का प्रयास किया कि अब वक्त बदल चुका है, प्रदेश की जनता अब हरियाणा की राजनीति सिर्फ कुछ घरानों तक ही सीमित नहीं रखना चाहती। उधर, रही-सही कसर गृहमंत्री अमित शाह समेत भाजपा के अन्य स्टार प्रचारकों ने पूरी कर दी। इन नेताओं के निशाने पर भी हरियाणा में परिवारवाद की राजनीति ही रही।
भाजपा के इस आक्रामक चुनाव प्रचार और घेराबंदी के बावजूद इन घरानों के लिए सियासत की विरासत बढ़ती रहे, इसके लिए इन घरानों को बेहतरहीन प्रदर्शन की दरकार है। विधानसभा की इस चुनावी जंग में यदि देखें, तो इन घरानों ने जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। इन घरानों के सदस्य जिस सीट से खड़े थे, वहां इन प्रत्याशियों की ओर से जी-तोड़ मेहनत भी की गई।
देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री ताऊ देवीलाल का परिवार इस बार टूटकर चुनाव लड़ा। देवीलाल के दोनों पौत्र व पूर्व सीएम ओमप्रकाश चौटाला के दोनों बेटों अभय चौटाला और अजय चौटाला दोनों की राहें इस चुनाव में अलग थी। अभय इंडियन नेशनल लोकदल से चुनाव लड़ रहे थे, तो इनेलो से अलग हुई अजय चौटाला की जननायक जनता पार्टी की टिकट पर उनके बेटे दुष्यंत चौटाला व पत्नी नैना सिंह चौटाला इस बार चुनाव मैदान में थी।
वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में मुख्य विपक्षी दल रहे इनेलो के लिए इस बार डगर आसान नहीं है और अभय चौटाला, दुष्यंत चौटाला व नैना सिंह चौटाला के लिए यह चुनाव बड़ी प्रतिष्ठा का भी सवाल है। जजपा ने हरियाणा विधानसभा चुनाव में दमदार मौजूदगी दर्ज कराई है। अब वह किंगमेकर की भूमिका पर है। वहीं इनेलो हरियाणा में अपने अस्तित्व से लड़ रही है।
इसी तरह पूर्व सीएम भजनलाल व पूर्व सीएम बंसीलाल के घराने की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले भजनलाल के दोनों बेटे कुलदीप बिश्नोई व चंद्रमोहन बिश्नोई मैदान में है। पुत्रवधु रेणुका बिश्नोई ने इस बार चुनाव नहीं लड़ा। जबकि लोकसभा चुनाव हारने के बाद पौत्र भव्य बिश्नोई नई पारी के लिए सही समय व प्लेटफार्म का इंतजार कर रहे हैं। कुलदीप बिश्नोई आदमपुर लोकसभा सीटों से बढ़त बनाए हुए हैं।
ऐसे में कुलदीप और बिश्नोई की जीत अपने सियासी घराने की प्रतिष्ठा और भविष्य से जुड़ी है। इसी तरह पूर्व सीएम बंसीलाल की पुत्रवधु किरण चौधरी, उनके बेटे रणबीर महेंद्र व दामाद सोमबीर सिंह भी इस चुनावी रण में है। बंसीलाल घराने की यह पीढ़ी घराने की सियासी विरासत को आगे बढ़ाने में जुटी हुई है।
हालांकि बंसीलाल की पौत्री पूर्व सांसद श्रुति चौाधरी इस साल लोकसभा चुनाव हार चुकी हैं। मगर परिवार की सियासत को आगे बढ़ाने के लिए अब किरण, रणबीर और सोमबीर को जीतना जरूरी होगा।
अहीरवाल बेल्ट से विधायक रहे राव अभय सिंह की सियासी विरासत उनके बेटे कैप्टन अजय यादव आगे बढ़ा रहे हैं। हरियाणा के पूर्व मंत्री रहे कैप्टन अजय यादव ने इस बार लोकसभा चुनाव लड़ा था, मगर हार का मुंह देखना पड़ा। इसके बाद उन्होंने इस बार विधानसभा चुनाव से किनारा कर अपनी अगली पीढ़ी अपने बेटे राव चिरंजीव यादव (लालू प्रसाद यादव के दामाद) को लांच किया है।
चिरंजीव पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं, इसलिए घराने की सियासत को आगे बढ़ाने केलिए चिरंजीव का जीतना जरूरी है। इसी तरह किसानाें का मसीहा रहे सर छोटू राम के नाती राज्यसभा सदस्य चौधरी बीरेंद्र सिंह उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे है।
उन्होंने अपनी अगली पीढ़ी यानी अपने बेटे पूर्व आईएएस बृजेंद्र सिंह को लोकसभा चुनाव जितवाकर सांसद बना दिया है और अब उनकी पत्नी प्रेमलता फिर से मैदान में हैं। प्रेमलता का मुकाबला बेहद कड़ा है, लिहाजा उन्हें भी जीत की प्रबल आस है।