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एसवाईएल मुद्दे पर पंजाब-हरियाणा के बीच हुई बैठक रही बेनतीजा, कैप्टन बोले- जल उठेगा राज्य

Wed, 19 Aug 2020 06:25 AM IST
खुशबू गोयल अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

  • बैठक करेंगे कैप्टन अमरिंदर सिंह और मनोहर लाल खट्टर
  • केंद्रीय भूजल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत रहेंगे मौजूद
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एसवाईएल मुद्दे पर बैठक - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सतलुज यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर पर मंगलवार को पंजाब, हरियाणा के मुख्यमंत्रियों और जलशक्ति मंत्री के बीच हुई बैठक बेनतीजा रही। पंजाब के सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सतलुज यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर का विरोध करते हुए दो टूक कहा है कि राज्य के लिए यह भावनात्मक मुद्दा है।
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अगर नहर का पानी हरियाणा के साथ साझा करने के लिए कहा जाता है तो पंजाब जल उठेगा। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत नई दिल्ली में थे जबकि अमरिंदर सिंह चंडीगढ़ से ही वीडियो लिंक के माध्यम से उनसे जुड़े। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हुई बैठक में दोनों राज्य अपने-अपने रुख पर अड़े रहे। सुप्रीम कोर्ट ने 28 जुलाई को दशकों पुराने विवाद में केंद्र सरकार को मध्यस्थता करने का निर्देश दिया था। इस मामले में हरियाणा और पंजाब के मुख्यमंत्रियों के बीच यह पहली बैठक है।



अमरिंदर ने केंद्रीय मंत्री शेखावत से कहा आप इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिये से देखें। अगर आप एसवाईएल नहर पर आगे बढ़ते हैं तो पंजाब जल जाएगा। यह राष्ट्रीय समस्या बन जाएगा और इसका असर हरियाणा और राजस्थान तक होगा। इस मुद्दे को तूल देकर पाकिस्तान प्रतिबंधित सिख फॉर जस्टिस संगठन के अलगाववादी मूवमेंट को फिर से भड़का सकता है। यह मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित भी कर सकता है।
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फिर बैठक पर दोनों सहमत

दोनों ही मुख्यमंत्रियों ने एसवाईएल नहर को लेकर हुई पहली बैठक को सौहार्दपूर्ण बताया और आगे फिर से चंडीगढ़ में बात करने पर सहमति जताई। बैठक के दौरान पंजाब ने एसवाईएल नहर प्रोजेक्ट के जरिये पानी साझा करने को लेकर अनिच्छा जताई और कहा कि उसके पास अतिरिक्त पानी नहीं है। अमरिंदर ने नदी जल उपलब्धता का समयबद्ध मूल्यांकन के लिए ट्रिब्यूनल की आवश्यकता दोहराई।

केंद्रीय मंत्री का सुझाव, एसवाईएल का काम पूरा हो
शेखावत ने सुझाव दिया कि एसवाईएल का काम पूरा किया जा सकता है, जबकि पानी साझा करने का अंतिम फार्मूला तय होने तक बातचीत जारी रह सकती है। उन्होंने कहा, पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने अपना अपना दृष्टिकोण रखा है। अगली बैठक बात वहीं से शुरू होगी, जहां आज खत्म हुई है। बैठक का जो भी नतीजा हो, हम सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराएंगे।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ प्रस्ताव पास कर चुकी है पंजाब कैबिनेट

एसवाईएल का मुद्दा पंजाब के लिए राजनैतिक अधिक है। यह मामला सूबे में सरकार बदलने की क्षमता रखता है। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा बार-बार हरियाणा के पक्ष में फैसले दिए जाते रहे हैं। 2017 में तो एसवाईएल पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मुकदमा भी पंजाब सरकार के खिलाफ दर्ज हुआ था, जब हरियाणा के पक्ष में आए फैसले के अगले ही दिन पंजाब सरकार ने कैबिनेट की बैठक बुलाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के उलट फैसला लेते हुए आदेश जारी किए थे।

सुप्रीम कोर्ट में भी अपने रुख पर अड़ा रहा है पंजाब
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों से एसवाईएल के मुद्दे का बातचीत के जरिये हल करने को कहा है। जस्टिस अरुण मिश्र की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि इस मुद्दे पर बड़े राजनैतिक स्तर पर वार्ता की जरूरत है। पीठ वास्तव में दोनों राज्यों से जानना चाहता है कि वे बातचीत के जरिये इस विवाद को हल कर सकते हैं या नहीं? सुप्रीम कोर्ट अब अगस्त के तीसरे हफ्ते में इस मामले पर सुनवाई करेगा। वहीं, पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि वह अपने किसानों के हितों को नजरअंदाज कर दूसरे राज्यों को पानी नहीं दे सकता।

पंजाब ने यह भी कहा कि इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट को सुनवाई नहीं करनी चाहिए बल्कि इस मामले को ट्रिब्यूनल के समक्ष सुना जाना चाहिए। पंजाब का कहना है कि सतलज, यमुना ब्यास नदी के पानी पर पहले हमारा हक है। पंजाब ने यह भी कहा कि हम अदालती आदेश का पालन करना चाहते हैं लेकिन अपने किसानों को नजरअंदाज कर ऐसा नहीं कर सकते। हमारे किसान भूख से मरें और हम सतलुज, यमुना और ब्यास नदी का पानी किसी और क्यों दें। पानी हमारी जरूरत हैं। पंजाब के इसी रुख के कारण वर्षों से इस मामले का समाधान नहीं निकल पा रहा।

ये है एसवाईएल का मामला

- 24 मार्च 1976 को केंद्र की तरफ से हरियाणा को 3.5 एमएएफ पानी देने की अधिसूचना जारी हुई
- 8 अप्रैल 1982 को पूर्व पीएम इंदिरा गांधी ने पटियाला के कपूरी गांव के पास नहर खुदाई का उद्घाटन किया
- 24 जुलाई 1985 को राजीव-लौंगोवाल समझौता हुआ। पंजाब ने नहर बनाने की सहमति दी

- 1996 में समझौता सिरे नहीं चढ़ने पर हरियाणा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की
- 15 जनवरी 2002 को सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब को एक वर्ष में एसवाईएल बनाने का निर्देश दिया
- 4 जून 2004 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पंजाब की याचिका खारिज हुई

- 2004 में ही पंजाब ने पंजाब टर्मिनेशन आफ एग्रीमेंट एक्ट-2004 बनाकर तमाम जल समझौते रद्द कर दिए
- 20 अक्टूबर 2015 ने मनोहर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से राष्ट्रपति के रेफरेंस पर सुनवाई के लिए संविधान पीठ गठित करने का अनुरोध किया।
- 26 नवंबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया, इसके बाद पंजाब ने फिर अपील की, मामला विचाराधीन
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विवाद करीब 44 साल पुराना

यह विवाद करीब 44 साल पुराना है। 24 मार्च 1976 को केंद्र सरकार ने पंजाब के 7.2 एमएएफ यानी मिलियन एकड़ फीट पानी में से 3.5 एमएएफ हिस्सा हरियाणा को देने की अधिसूचना जारी की थी। पूर्व पीएम इंदिरा गांधी ने 8 अप्रैल 1982 को पंजाब के पटियाला जिले के कपूरई गांव में एसवाईएल का उद्घाटन किया था।

24 जुलाई 1985 को राजीव-लोंगोवाल समझौते को लागू किया गया था और पंजाब ने नहर के निर्माण के लिए अपनी सहमति दी थी, लेकिन समझौते के धरातल पर लागू नहीं होने के बाद हरियाणा ने 1996 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

दरअसल, पंजाब के राजनेता पड़ोसी राज्य हरियाणा के साथ पानी साझा करने के पक्ष में नहीं हैं। पंजाब नहर के लिए अधिग्रहित जमीन किसानों को वापस कर चुका है। इसके लिए एक विधेयक भी विधानसभा में पारित किया गया था, जिससे स्थिति और अधिक जटिल हो गई है। नहर को मिट्टी से भर दिया गया है।
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